यद्धपि मैंने जैन धर्म में ही जन्म लिया , पर 'जैनिज़्म' मुझमे ज़रा भी नहीं। बल्कि अपने कटु अनुभवो के कारण अपने समाज से इतनी दूरी बन गयी ,सदा के लिये कि अब वापस पीछे लौटना सम्भव नहीं , धृणा हो गयी सदा के लिए। इसमे मेरा कोई दोष मुझे नहीं दीखता बल्कि इस बनिया समाज का ही है जो इतना खराब व्यवहार किया करता है। यह सब एक दिन में नहीं हुआ , की वर्षो की घटनाये है।
बहुत वर्ष पहले मेरे दादाजी नगरसेठ हुआ करते थे , जैन मंदिर के सामने ही घर हुआ करता था। शहर में एक ही स्थानकवासी जैन- हम लोग हुआ करते थे , बाकी सब मंदिरमार्गी थे , यानी मूर्तिपूजक ! परन्तु हमलोग समाज में, मंदिर में आया जाया करते थे। नगर में आधे से ज्यादा चोपड़ा लोग थे जिनकी बहुलता के कारण . एक बार चोपड़ा लोगो से किसी झगड़े के कारण हमारे परिवार को "जात बाहर " कर दिया . मेरी दादी बड़ी दबंग थी , झुकना तो जैसे उसने सीखा ही नहीं था। इसका प्रभाव यह हुआ कि हमारे परिवार ने मंदिर आना जाना बंद कर अपने में ही लीन हो गए , वैसे भी स्थानकवासी थे यानी घर पर ही पूजा पाठ। धीरे धीरे वैष्णव/सनातन धर्मी हो गए। परन्तु समाज की परवाह नहीं की , कारण राजनीतिक दृष्टि से मेरा परिवार ताकतवर था। और हम लोगों के संस्कार ही बदल गए। लगभग १५ वर्षो तक यह चला फिर धीरे धीरे चोपड़ा लोग ही झुक कर आने लगे बात करने की कोशिस करने लगे। फिर भी नयी पीढी समेत पुरानी पीढ़ी की आदते बदल चुकी थी। उन दिनों जैनसाधुओं के ठहरने की भी व्यवस्था नहीं थी , मंदिर के सामने घर हमारा ही होने के कारण , समाज वालो को ही उन्हें ठहराने हमारे परिवार की विनती करनी पड़ती। अब मंदिर मार्गी हो जा स्थानकवासी , या फिर तेरा पंथी , सभी साधुगण हमारे शहर से गुजरते , तो हमारे घर के सामने वाले हिस्से में ही ठहरते . मैंने बचपन से इन सभी साधुओ को देखा , और पंथविहीन बन गया।, क्योकि हमारे परिवार ने सभी पंथो के साधुओ को बराबर सम्मान दिया , परन्तु धार्मिक कट्टरता पूरी तरह समाप्त हो चुकी थी। पिताजी शंकर जी के भक्त थे तो माताजी हनुमान जी की , दादी जी यदा कदा माताजी/कुुु देवी के लिए दिया जलाती थी , तो दादाजी कभी माताजी को तो कभी ग्राम देवता को , सभी जैन धर्म कि पूजा पाठ से कोसो दूर थे। यद्दपि हमारे यहाँ जैनसाधु तो बहुत ठहरे पर मेरा घर "अभिशप्त" भी हो गया था परन्तु किसी साधू ने यह नहीं जाना और न कोई उपचार बताया या किया। केवल भाषणबाज साधुओ से मेरी दूरी का एक कारण यह भी था ! (अब भी मैं प्रवचन सुनने नहीं जाता क्योकि भगवान ने मुझे ही इतना ज्ञान दे दिया कि जरूरत ही नहीं किसी को "झेलने" की )
कालेज की शिक्षा के बाद , मै एक बड़े शहर में पढने आया , तो रिश्ते में फूफाजी की मदद से जैन दादाबाड़ी में रहने की व्यवस्था हुई। हालांकि वहा के लडको स मुझे कोई मतलब नहीं था क्योंकि मै एक अलग कोर्स करने आया था न कि कालेज की आगे की पढ़ाई। फिर भी एक गुंडे जैन लडके ने जिसका सम्बन्ध आर एस एस से भी था , ने अपने तथ्यो के साथ मेरी रैकिंग ली बहुत ही बुरा व्यवहार किया , डंडा भी लगाया। मै तो कालेज लाइफ के बाद भी एकदम सीधा सादा था , तिस पर पहली बार घर से अकेला निकला रहने और पढने को । फूफाजी की मदद से जैनसमाज के ट्रस्टियों से इसकी शिकायत की, उन्होंने कड़ी कार्यवाही का केवल आश्वासन दिया पर किया कुछ नहीं। मेरा दिमाग तो उस दिन इतना खराब हुआ था कि मै अहिंसक प्राणी रामपुरी चाक़ू खोज रहा था , ताकि उस जैन छोकरे के पेट में घोप दू और जैन समाज देखेगा कि उसके ही भवन में एक जैन ने दूसरे जैन की हत्या कर दी , तब अहिंसा परमो धर्म का भेद पूरी दुनिया के सामने खुलकर आ जाएगा। पर ये हो न सका शायद ईश्वर को यह मंजूर नहीं था। इस घटना से मुझे जैन समाज से विरक्त कर दिया। (घटना समय लगभग 1978 की )
समय बड़े बड़े घावो को भर देता है, ऐसा कहा जाता है । मुझे फिर खुजली हुई जैन समाज की सेवा करने को, कारण , सभी लोगो को देखता था अपने अपने समाज की सेवा करते , पक्ष लेते। तो मैंने सोंचा की न अपने समाज की सेवा की जाए , ताकि उन लोगो के परिवारो को जिनके यहाँ विविध कष्ट हो रहे है , मुझे ज्योतिष का सच्चा ज्ञान है और जीवन में हुई एक अजीब सी घटना के कारण गहन अध्यात्मिक ज्ञान भी हुआ दैव कृपा से। तो मैंने एक पुस्तक प्रकाशित किया। और वह भी बिना किसी सामाजिक सहायता के (क्योकि जैन समाज ड्रामा ज्यादा करता है , नाम बड़े दर्शन खोटे ब्रांड के पाये जाते है ). कुछेक लोगो ने मेरी भावना और कृति की प्रशंसा की, तो किसी ने बेइज्जती भी , कुछ तेरापंथी जैनो ने तो मेरी कुछ किताब भीड़ का फायदा उठाकर चुरा लिया , फिर भी मैंने मन साफ़ रखा आखिर माताजी की ही तो सेवा कर रहा हूं। दूसरे गोत्रो की कुलदेवियों का भी तो आशीर्वाद मुझे ही मिलेगा। पर एक तेरापंथी जैन तो मुझे कहने लगा कि यहाँ से हट जाओ , इस किताब में गलत बाते लिखी है ! आपत्तिजनक है ! मैंने ध्यान नहीं दिया क्योकि जो मैंने पाया था , वही लिखा . सालो मैं की बाते जानने के लिए अनेक सिद्ध पुरुषो के पास , ज्ञानियो के पास भटका (सभी सनातन धर्म के थे ). अनेक तर्क वितर्क किये , परीक्षाये उनकी ली , तब ही तो ज्ञान हुआ। अगले साल ओसवाल जाति का इतिहास मैंने पढ़ा , फिर सोंचा मैंने तो पढ़ लिया , पर अनेक दूसरे है जो यह सब पढ़ नहीं पाते और अपने इतिहास का ज्ञान ही नहीं होता , यह सोंचकर मैंने स्थानीय रूप से एक नए प्रकाशन "जीवन साथी" नामक पत्रिका में कुछ लेख लिखे ताकि नयी पीढी को कुछ जानकारी मिल सके। (सन २००० के आस पास की घटना )
और एक पम्पलेट भी अपने खर्चे से छपवाया बांटने को , पर महावीर जयंती के रोज कुछ कट्टरपंथी /तेरापंथी जैन समाज के लोग आकर झगड़ा करने लगे , पम्पलेट में गलत बाते लिखी है , जबकि पम्पलेट में जो संक्षिप्त इतिहास लिखा था वह सिर्फ इंटरनेट पर प्रकाशित जैन समाज के इतिहास का अंगरेजी से हिंदी में अनुवाद मात्र था। इतिहास किसी विद्वान ने ही लिखा होगा। जब यह झगड़ा चल रहा था तो
मंदिर-मार्गी जैन जिनके मंदिर /दादाबाड़ी में मै खडा था वहा तेरापंथियो की दादागिरी देखते चुपचाप , और मजा लेते खड़े थे . इस घटना से आहत हो कर मुझे वहा से जाना पड़ा , कुछ पम्पलेट भी उन कुत्तो ने जब्त कर लिया . इसके बाद मैंने जैन समाज के कार्यक्रमो में जाना , जैन मंदिर जाना , उत्सवो में शामिल होना पूरी तरह बंद कर दिया। मुझे ऐसा लगता है मानो एक सात्विक हिन्दू , मुस्लिम समाज के कार्यक्रम घुस जाए तो उसे महसूस होता है। धन्य है ईश्वर , जिसने मुझे सच्चाई का ज्ञान दिया और मुझे उस पाखंडी धर्म से बिलकुल दूर कर दिया , और नफ़रत भर दिया इस समाज से ! अब मै मुक्त महसूस करता हूँ , और जहा मे आस्था होती है , वहीँ श्रद्धा से जाता हूँ। (बीज जो डाला गया था, अब वह वृक्ष बन गया है, जो कट तो सकता है , पर वापस पौधा नहीं बन सकता ) . इस घटना के बाद कभी जैन आये ज्योतिषीय सलाह लेने मैंने मना कर दिया कि मैंने जैनियों की सेवा बंद कर दिया है। वैसे भी जैनियों के साथ काफ़ी कड़वा अनुभव हो चुका है , बनिया और कपटी समाज है ये , साथ ही संयोग से मैं स्वयं भी खुदा की गलती से जैन धर्म में पैदा होने से अनेक बार दूसरे समाज के लोगो से अपमानित भी हुआ जाने अनजाने में। की बार तो लोग मेरे सामने मारवाड़ियों को गाली देते थे , क्योकि उन्हें पता नहीं होता कि मै भी मारवाड़ी हूँ , बाद में पता चलता तो माफ़ी मांगते थे , परन्तु मै उन्हें जवाब देता था कि भाई तुम जो कह रहे हो वो तुम्हारा अनुभव ही है , बनिया कौम सचमुच ऐसा ही है , निपट स्वार्थी , किसी का नहीं। मेरा मारवाड़ी समाज ऐसा ही है इसलिए गालिया खाता है। ब्याजखोर , खून चूसनेवाला आदि तारीफ़ के शब्द अक्सर सुनने को मिलते ही है।
बहुत वर्ष पहले मेरे दादाजी नगरसेठ हुआ करते थे , जैन मंदिर के सामने ही घर हुआ करता था। शहर में एक ही स्थानकवासी जैन- हम लोग हुआ करते थे , बाकी सब मंदिरमार्गी थे , यानी मूर्तिपूजक ! परन्तु हमलोग समाज में, मंदिर में आया जाया करते थे। नगर में आधे से ज्यादा चोपड़ा लोग थे जिनकी बहुलता के कारण . एक बार चोपड़ा लोगो से किसी झगड़े के कारण हमारे परिवार को "जात बाहर " कर दिया . मेरी दादी बड़ी दबंग थी , झुकना तो जैसे उसने सीखा ही नहीं था। इसका प्रभाव यह हुआ कि हमारे परिवार ने मंदिर आना जाना बंद कर अपने में ही लीन हो गए , वैसे भी स्थानकवासी थे यानी घर पर ही पूजा पाठ। धीरे धीरे वैष्णव/सनातन धर्मी हो गए। परन्तु समाज की परवाह नहीं की , कारण राजनीतिक दृष्टि से मेरा परिवार ताकतवर था। और हम लोगों के संस्कार ही बदल गए। लगभग १५ वर्षो तक यह चला फिर धीरे धीरे चोपड़ा लोग ही झुक कर आने लगे बात करने की कोशिस करने लगे। फिर भी नयी पीढी समेत पुरानी पीढ़ी की आदते बदल चुकी थी। उन दिनों जैनसाधुओं के ठहरने की भी व्यवस्था नहीं थी , मंदिर के सामने घर हमारा ही होने के कारण , समाज वालो को ही उन्हें ठहराने हमारे परिवार की विनती करनी पड़ती। अब मंदिर मार्गी हो जा स्थानकवासी , या फिर तेरा पंथी , सभी साधुगण हमारे शहर से गुजरते , तो हमारे घर के सामने वाले हिस्से में ही ठहरते . मैंने बचपन से इन सभी साधुओ को देखा , और पंथविहीन बन गया।, क्योकि हमारे परिवार ने सभी पंथो के साधुओ को बराबर सम्मान दिया , परन्तु धार्मिक कट्टरता पूरी तरह समाप्त हो चुकी थी। पिताजी शंकर जी के भक्त थे तो माताजी हनुमान जी की , दादी जी यदा कदा माताजी/कुुु देवी के लिए दिया जलाती थी , तो दादाजी कभी माताजी को तो कभी ग्राम देवता को , सभी जैन धर्म कि पूजा पाठ से कोसो दूर थे। यद्दपि हमारे यहाँ जैनसाधु तो बहुत ठहरे पर मेरा घर "अभिशप्त" भी हो गया था परन्तु किसी साधू ने यह नहीं जाना और न कोई उपचार बताया या किया। केवल भाषणबाज साधुओ से मेरी दूरी का एक कारण यह भी था ! (अब भी मैं प्रवचन सुनने नहीं जाता क्योकि भगवान ने मुझे ही इतना ज्ञान दे दिया कि जरूरत ही नहीं किसी को "झेलने" की )
कालेज की शिक्षा के बाद , मै एक बड़े शहर में पढने आया , तो रिश्ते में फूफाजी की मदद से जैन दादाबाड़ी में रहने की व्यवस्था हुई। हालांकि वहा के लडको स मुझे कोई मतलब नहीं था क्योंकि मै एक अलग कोर्स करने आया था न कि कालेज की आगे की पढ़ाई। फिर भी एक गुंडे जैन लडके ने जिसका सम्बन्ध आर एस एस से भी था , ने अपने तथ्यो के साथ मेरी रैकिंग ली बहुत ही बुरा व्यवहार किया , डंडा भी लगाया। मै तो कालेज लाइफ के बाद भी एकदम सीधा सादा था , तिस पर पहली बार घर से अकेला निकला रहने और पढने को । फूफाजी की मदद से जैनसमाज के ट्रस्टियों से इसकी शिकायत की, उन्होंने कड़ी कार्यवाही का केवल आश्वासन दिया पर किया कुछ नहीं। मेरा दिमाग तो उस दिन इतना खराब हुआ था कि मै अहिंसक प्राणी रामपुरी चाक़ू खोज रहा था , ताकि उस जैन छोकरे के पेट में घोप दू और जैन समाज देखेगा कि उसके ही भवन में एक जैन ने दूसरे जैन की हत्या कर दी , तब अहिंसा परमो धर्म का भेद पूरी दुनिया के सामने खुलकर आ जाएगा। पर ये हो न सका शायद ईश्वर को यह मंजूर नहीं था। इस घटना से मुझे जैन समाज से विरक्त कर दिया। (घटना समय लगभग 1978 की )
समय बड़े बड़े घावो को भर देता है, ऐसा कहा जाता है । मुझे फिर खुजली हुई जैन समाज की सेवा करने को, कारण , सभी लोगो को देखता था अपने अपने समाज की सेवा करते , पक्ष लेते। तो मैंने सोंचा की न अपने समाज की सेवा की जाए , ताकि उन लोगो के परिवारो को जिनके यहाँ विविध कष्ट हो रहे है , मुझे ज्योतिष का सच्चा ज्ञान है और जीवन में हुई एक अजीब सी घटना के कारण गहन अध्यात्मिक ज्ञान भी हुआ दैव कृपा से। तो मैंने एक पुस्तक प्रकाशित किया। और वह भी बिना किसी सामाजिक सहायता के (क्योकि जैन समाज ड्रामा ज्यादा करता है , नाम बड़े दर्शन खोटे ब्रांड के पाये जाते है ). कुछेक लोगो ने मेरी भावना और कृति की प्रशंसा की, तो किसी ने बेइज्जती भी , कुछ तेरापंथी जैनो ने तो मेरी कुछ किताब भीड़ का फायदा उठाकर चुरा लिया , फिर भी मैंने मन साफ़ रखा आखिर माताजी की ही तो सेवा कर रहा हूं। दूसरे गोत्रो की कुलदेवियों का भी तो आशीर्वाद मुझे ही मिलेगा। पर एक तेरापंथी जैन तो मुझे कहने लगा कि यहाँ से हट जाओ , इस किताब में गलत बाते लिखी है ! आपत्तिजनक है ! मैंने ध्यान नहीं दिया क्योकि जो मैंने पाया था , वही लिखा . सालो मैं की बाते जानने के लिए अनेक सिद्ध पुरुषो के पास , ज्ञानियो के पास भटका (सभी सनातन धर्म के थे ). अनेक तर्क वितर्क किये , परीक्षाये उनकी ली , तब ही तो ज्ञान हुआ। अगले साल ओसवाल जाति का इतिहास मैंने पढ़ा , फिर सोंचा मैंने तो पढ़ लिया , पर अनेक दूसरे है जो यह सब पढ़ नहीं पाते और अपने इतिहास का ज्ञान ही नहीं होता , यह सोंचकर मैंने स्थानीय रूप से एक नए प्रकाशन "जीवन साथी" नामक पत्रिका में कुछ लेख लिखे ताकि नयी पीढी को कुछ जानकारी मिल सके। (सन २००० के आस पास की घटना )
और एक पम्पलेट भी अपने खर्चे से छपवाया बांटने को , पर महावीर जयंती के रोज कुछ कट्टरपंथी /तेरापंथी जैन समाज के लोग आकर झगड़ा करने लगे , पम्पलेट में गलत बाते लिखी है , जबकि पम्पलेट में जो संक्षिप्त इतिहास लिखा था वह सिर्फ इंटरनेट पर प्रकाशित जैन समाज के इतिहास का अंगरेजी से हिंदी में अनुवाद मात्र था। इतिहास किसी विद्वान ने ही लिखा होगा। जब यह झगड़ा चल रहा था तो
मंदिर-मार्गी जैन जिनके मंदिर /दादाबाड़ी में मै खडा था वहा तेरापंथियो की दादागिरी देखते चुपचाप , और मजा लेते खड़े थे . इस घटना से आहत हो कर मुझे वहा से जाना पड़ा , कुछ पम्पलेट भी उन कुत्तो ने जब्त कर लिया . इसके बाद मैंने जैन समाज के कार्यक्रमो में जाना , जैन मंदिर जाना , उत्सवो में शामिल होना पूरी तरह बंद कर दिया। मुझे ऐसा लगता है मानो एक सात्विक हिन्दू , मुस्लिम समाज के कार्यक्रम घुस जाए तो उसे महसूस होता है। धन्य है ईश्वर , जिसने मुझे सच्चाई का ज्ञान दिया और मुझे उस पाखंडी धर्म से बिलकुल दूर कर दिया , और नफ़रत भर दिया इस समाज से ! अब मै मुक्त महसूस करता हूँ , और जहा मे आस्था होती है , वहीँ श्रद्धा से जाता हूँ। (बीज जो डाला गया था, अब वह वृक्ष बन गया है, जो कट तो सकता है , पर वापस पौधा नहीं बन सकता ) . इस घटना के बाद कभी जैन आये ज्योतिषीय सलाह लेने मैंने मना कर दिया कि मैंने जैनियों की सेवा बंद कर दिया है। वैसे भी जैनियों के साथ काफ़ी कड़वा अनुभव हो चुका है , बनिया और कपटी समाज है ये , साथ ही संयोग से मैं स्वयं भी खुदा की गलती से जैन धर्म में पैदा होने से अनेक बार दूसरे समाज के लोगो से अपमानित भी हुआ जाने अनजाने में। की बार तो लोग मेरे सामने मारवाड़ियों को गाली देते थे , क्योकि उन्हें पता नहीं होता कि मै भी मारवाड़ी हूँ , बाद में पता चलता तो माफ़ी मांगते थे , परन्तु मै उन्हें जवाब देता था कि भाई तुम जो कह रहे हो वो तुम्हारा अनुभव ही है , बनिया कौम सचमुच ऐसा ही है , निपट स्वार्थी , किसी का नहीं। मेरा मारवाड़ी समाज ऐसा ही है इसलिए गालिया खाता है। ब्याजखोर , खून चूसनेवाला आदि तारीफ़ के शब्द अक्सर सुनने को मिलते ही है।