शनिवार, 21 नवंबर 2020
HASTREKHA AT RAIPUR/हस्तरेखा रायपुर में (C.G.)
मंगलवार, 7 नवंबर 2017
मेरी जैनियो की कुलदेवी पर पुस्तक
पुस्तक की कीमत 100/-रु+डाक खर्च 100/-
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रविवार, 18 जून 2017
ब्राम्हणो से नफरत क्यो??
ये दुसरो के लिखे विचार है,पर दमदार है इसलिए शामिल किया गया लोक कल्याण के लिए---
नफरत सिर्फ ब्राह्मणों के खिलाफ क्यों फैली? नफरत यादव, सुनार, धोबी, कुम्हार या बाकी जातियों के खिलाफ क्यों नहीं फैली? ये एक वाजिब प्रश्न है।
सुनिए जरा...
अगर आप यादव से नफरत करेंगे तो उससे दूध लेना बंद कर देंगे; पर फिर भी हिन्दू रहेंगे।
अगर आप सुनार से नफरत करेंगे तो उससे आभूषण बनवाना बंद कर देंगे; पर फिर भी आप हिन्दू रहेंगे।
अगर आप धोबी, कुम्हार से नफरत करेंगे तो कपड़े धुलवाना और बर्तन खरीदना बंद कर देंगे; पर फिर भी आप हिन्दू रहेंगे।
पर, अगर आप ब्राह्मण से नफरत करेंगे तो तो आप सभी धार्मिक रस्मों जैसे कि जन्म, शादी, मृत्यु के लिए उसके पास जाना बंद कर देंगे और और ये सब रस्में आ कर चर्च का पादरी करेगा।
ब्राह्मणों से नफरत करना यानी
anti-brahminism, 2000 साल पुराने "जोशुआ" प्रोजेक्ट का हिस्सा है जिसका एजेंडा पूरे हिंदुस्तान को ईसाई मुल्क बनाना है। हिंदुओं का धर्मान्तरण तब तक नहीं हो सकता जब तक वे ब्राह्मणों के संपर्क में हैं।
हिन्दू जातियों में ब्राह्मणों के लिए इतनी नफरत बढ़ाओ की वे ब्राह्मणों के पास किसी भी काम के लिए जाना बंद कर दें और धर्मान्तरण के दरवाजे खुल जाएं।
सबसे पहले ईसाई मिशनरी Robert Caldwell ने आर्यन-द्रविड़ियन थ्योरी बनाई ताकि दक्षिण भारतीयों को अलग पहचान देकर धर्मान्तरण किया जाए, जिसमे उत्तर भारतीयों को ब्राह्मण आर्यन दिखाया गया।
इनकी एजेंडा यहां खत्म नहीं हुआ। इसके बाद दूसरे मिशनरी और संस्कृत विद्वान John Muir ने मनुस्मृति को एडिट किया, इसमें वामपंथियों ने वैसे ही मदद की जैसे कि 26/11 के मुम्बई हमले में भारतीय मुसलमानों ने मदद की।
ब्राह्मण विरोध के चलते अम्बेडकर ने कई हिन्दू जातियों को दलित के नाम से टैग कर दिया जो ब्रिटिश सरकार में डिप्रेस्ड क्लासेज थीं। मंडल कमीशन के ब्राह्मण विरोधियों ने कई जातियों को पिछड़ा घोषित कर दिया जिनके राजघराने तक चलते थे।
ब्राह्मण विरोध, सनातन विरोध का ही छद्म नाम है। क्योंकि ब्राह्मणवाद, मनुवाद तो बहाना है;
असली मकसद हिन्दू धर्म को मिटाना है।
शनिवार, 17 जून 2017
गुंडे को सुधार दिया
मैं बीकॉम में था जबकि मेरा एक मित्र बीए में पढ़ रहा था, बहुत कसरतें करता रहता था,बॉडी बनाना उसका शौक था। पर यहां तक तो ठीक था, उसे शक्ति प्रदर्शन करना भी अच्छा लगता था यानी दादागिरी।
उसके मोहल्ले में जमादार लोग भी रहते थे जिनकी हरकते भी संस्कारवश वैसे ही रहा करती थी,उनसे मित्र का परिवार भी परेशान रहता था। अक्सर झगड़ा होता रहता था। एक दो बार मेरा दादाछाप मित्र उनको चाकू लेकर मारने भी दौड़ा था। पढ़ने लिखने में रुचि बहुत कम थी।
रोज शाम को मैं कुछ मित्रो के साथ घूमने निकला करता था तो ये दादानुमा मित्र भी मिल जाया करता था। कुछ दिन बाद मुझे सूझा इसकी लाइन ठीक किया जाए यानी सुधार जाए।
रोज घूमते2 मैं उससे तर्क करने लगा जैसे बताओ तो यार ग्रेजुएशन के बाद क्या करने का इरादा है? तो वह जवाब देता किसी सेठ का बॉडी गार्ड बन जाऊंगा, तनखा भी अच्छी मिलेगी। कसरती बदन का उपयोग भी होगा।फिर मैं उससे पूछता,यदि सेठ पर कोई विपत्ति आयी और हमलावर तुमसे ज्यादा संख्या में हो या ज्यादा शक्तिशाली हो तो? यदि तुम्हे घायल कर दिए या विकलांग कर दिए तो सेठों के किसी काम के नही रहोगे,वे तुम्हे निकाल देंगे,ऐसा भी हो सकता है तुमसे ज्यादा ताकतवर बॉडीगार्ड मिला तो तुम्हे निकालकर उसे रख लेंगे,फिर तुम बेटोजगार हो जाओगे।
इस तरह तर्क वितर्क करने से उसका दिमाग चलने लगा, दादागिरी से मन हटने लगा, फिर दिमाग पढ़ाई की ओर खिंचने लगा, पढाई सम्बन्धी टिप्स तो मैंने दिया ही। धीरे2 वह भी पढ़ाई में लिप्त हो गया,एम ए भी कर लिया और एक दिन शिक्षा विभाग में नौकरी पा लिया।उसके पीछे छोटे भाई और पिता जी के छोटे से होटल को भी सहारा मिला, पूरा परिवार संभल गया।
बुधवार, 30 जुलाई 2014
कैलेण्डर रचना और शुभ अशुभ
प्राचीन काल में आदि-मानव के पास समय जानने का साधन नहीं था। उसने निरिक्षण किया कि चन्द्रमा का एक चक्कर (पूर्णिमा से पूर्णिमा तक ) 28 दिन का होता है। तब उन्होंने इसके चार बराबर बराबर भाग किये
( 7 X 4=28 ). प्रत्येक भाग (7 दिन) को सप्ताह नाम दिया। फिर हर दिन को अलग अलग नाम उस काल के विद्वान व्यक्तियों के नाम पर रखा। इस प्रकार रविवार से शनिवार नाम रखे गए। ये हो सकता था की सोमवार का नाम गुरूवार और शनिवार का नाम सोमवार रखा जाता। अत: प्रकृति के समय को मोटे तौर पर इस ढंग से नापा गया और नामकरण किया गया। अब ज़रा सोंचे कि सभी दिन तो एक समान है , फिर कौन सा दिन अच्छा या बुरा होना चाहिए ? या कड़ावार और शांतवार ,शुभ या अशुभ होना चाहिए ?इसलिए मुझे लगता है किसी वार/दिन को शुभ और अशुभ बताना दरअसल धन्धेबाजी ही है , न कि वास्तविकता।
दूसरी तरफ पश्चिमी देशो में इसी तरह सूर्य कैलेण्डर =१२ महीने(जन से दिस ) की रचना की गयी। भारतीय कैलेण्डर चन्द्र और सूर्य कैलेण्डर को समायोजित काटते हुए बनाया गया है।
हर दिन ईश्वर ने ही रचना की है ,मनुष्य ने केवल नामकरण ही किया है , इसलिए हर दिन शुभ ही होगा ,धंधेबाजों के चंगुल से दूर रहे !
रविवार, 20 जुलाई 2014
तुलसी राम अपने पैरो पर खड़ा हो गया
सन 1990 -91 की बात है , मै अपने रेडीमेड कपडे की दूकान में था ,है स्कूल में साथ पढ़ा हुआ एक पुराना सहपाठी मेरे पास आया-तुलसी राम। बहुत परेशानी की हालत में था , बातचीत करने से आभास हुआ कि उसमे सुसाईडिंग टेंडेंसी /आत्महत्या की प्रेरणा भी शायद आ रही है। उसने अपना दुखड़ा रोया, जब से कालेज से निकला हूँ ,अभी तक बेरोजगार हूँ।कई साल पहले शादी भी हो चुकी है ,बच्चे भी है। परन्तु कमाने का ठिकाना नहीं ,नौकरी भी मिलती नहीं , हालत एकदम खस्ता है। जेब में पैसे ही नहीं है।
मैंने मजाक में उससे कहा - आदिवासी हो , सरकार के दामाद , तुम्हे नहीं मिलेगी तो क्या हमें मिलेगी ?उसने जवाब दिया - भाई ये आरक्षण वगैरह का फ़ायदा तो नेताओ ,अफसरों के रिश्तेदारो को ही मिलता है ,हमें कौन पूछता है ! बस नाम का ही आरक्षण है। मैंने कहा -नौकरी न सही खेती तो है ? खेती किसानी करो , उसमे भी कमाई है। उसने जवाब दिया -सिर्फ तीन एकड़ ( या शायद 5 एकड़ ) है ,वह भी करना संभव नहीं। तब मैंने कहा खुद का धंधा कर लो। इस पर उसने जवाब दिया- धंधे के लिए दूकान और पूंजी चाहिए ,कहा से लाऊंगा ?यहाँ तो दस रुपये भी नहीं रहता।
मैंने दिया - पैसे से ज्यादा दिमाग की जरुरत होती है, दिमाग रहे तो मिट्टी से सोना बना सकते हो ,नहीं तो सोने को मिटटी में लोग बदल देते है बिना अकल के । फिर मैंने उसे व्यावसायिक उदाहरण /अकल दिया- तुम खाली टीन खरीदो फिर उसे बेचकर थोड़ा थोड़ा कमाना शुरू कर दो। उसने कहा खाली टिन खरीदने के भी पैसे नहीं है। मैंने तर्क दिया -तुम्हारी जान पहचान अपने गाँवों में तो होगा?एक दो टिन तो उधार ले सकते हो ,बेचकर पैसे दुकानदार को दे देना,धीरे धीरे विश्वास बन जाएगा । धंधा करना है तो शर्म लिहाज बिलकुल त्याग दो , कमाना लक्ष्य बना लो,पैसा कमाने में शर्म कैसी ,कोई चोरी या गलत काम थोड़ी कर रहे हो ?धंधा कर रहे हो। रही बात नौकरी की, तो कोई बनिया 800 /-रु. देकर नौकर रखेगा ,12 घंटे रगड़कर काम लेगा ,खून चूसेगा , खुद का कोई काम पडेगा तो छुट्टी देने में नाटक करेगा और पैसे भी काट लेगा। उसने अनेक "किन्तु परन्तु छाप" शंकाए प्रकट की। मैंने भी अपने इस सहपाठी के सभी शंकाओ का समाधान कर दिया। वह शांत दिमाग से मेरी दूकान से बाहर निकला। और खाली टिन बेचने का ही धंधा शुरू कर दिया , मेरे आइडिया के अनुसार।
समय बीता ,"मेरे समय" ने पलटा खाया, चलती दुकान एक हादसे के बाद बंद हुई ,पूंजी पूरी तरह नष्ट हो गयी और अपने ज्ञान व हुनर के बलबूते पर मुझे नौकरी में आना पड़ा। एक फैक्ट्री में नौकरी करने आया और मैनेजर बन गया। वहा तुलसीराम ट्रक भर खाली टिन लेकर आया , छँटाई के बाद पैसे लेने दूसरे दिन आने कहा गया। परन्तु बाहर का मामला था अत : उसी दिन पैसे देने का अनुरोध उसने किया , तिस पर सुपरवाइजर ने मैनेजर साहब से मिलने का सुझाव दिया। अब मैनेजर को पूछते हुए वह मेरे केबिन आया तो दोनों एक दूसरे को देखकर चौंक पड़े। इस संयोग की कल्पना न मुझे थी न उसे। दोनों बड़े प्रसन्न हुए , इतने वर्षो बाद मिलकर। फिर बातचीत करते अपनी पूरी कहानी बताई कि कैसे तुम्हारे दूकान से मै शांत दिमाग से उतरा और खाली टिन का ही धंधा शुरू किया। तुम्हारा (यानी मेरा)आइडिया ,भगवान की दया और उसकी खुद की मेहनत का ही परिणाम था कि उसकी गरीबी दूर हो गयी , अब ट्रको खाली टिन खरीदता और बेचता है। उसने यह भी बताया -आज जो कुछ भी है तुम्हारी सलाह के कारण। अच्छा हुआ कि मैंने नौकरी नहीं की , नहीं तो गरीबी कायम रहती (ऐसा उसने ही कहा ),और सिर्फ 800 /-से 1000/-रु में जूते घिस रहा होता ,जबकि अभी हर माह कम से कम 5000/-महीना मै कमा रहा हूँ ,कभी कभी 7000/-तक भी फ़ायदा हो जाता है। अब मेरे घर में सब कुछ है।
शुक्रवार, 17 जनवरी 2014
और मै जैन समाज से दूर हो गया !
बहुत वर्ष पहले मेरे दादाजी नगरसेठ हुआ करते थे , जैन मंदिर के सामने ही घर हुआ करता था। शहर में एक ही स्थानकवासी जैन- हम लोग हुआ करते थे , बाकी सब मंदिरमार्गी थे , यानी मूर्तिपूजक ! परन्तु हमलोग समाज में, मंदिर में आया जाया करते थे। नगर में आधे से ज्यादा चोपड़ा लोग थे जिनकी बहुलता के कारण . एक बार चोपड़ा लोगो से किसी झगड़े के कारण हमारे परिवार को "जात बाहर " कर दिया . मेरी दादी बड़ी दबंग थी , झुकना तो जैसे उसने सीखा ही नहीं था। इसका प्रभाव यह हुआ कि हमारे परिवार ने मंदिर आना जाना बंद कर अपने में ही लीन हो गए , वैसे भी स्थानकवासी थे यानी घर पर ही पूजा पाठ। धीरे धीरे वैष्णव/सनातन धर्मी हो गए। परन्तु समाज की परवाह नहीं की , कारण राजनीतिक दृष्टि से मेरा परिवार ताकतवर था। और हम लोगों के संस्कार ही बदल गए। लगभग १५ वर्षो तक यह चला फिर धीरे धीरे चोपड़ा लोग ही झुक कर आने लगे बात करने की कोशिस करने लगे। फिर भी नयी पीढी समेत पुरानी पीढ़ी की आदते बदल चुकी थी। उन दिनों जैनसाधुओं के ठहरने की भी व्यवस्था नहीं थी , मंदिर के सामने घर हमारा ही होने के कारण , समाज वालो को ही उन्हें ठहराने हमारे परिवार की विनती करनी पड़ती। अब मंदिर मार्गी हो जा स्थानकवासी , या फिर तेरा पंथी , सभी साधुगण हमारे शहर से गुजरते , तो हमारे घर के सामने वाले हिस्से में ही ठहरते . मैंने बचपन से इन सभी साधुओ को देखा , और पंथविहीन बन गया।, क्योकि हमारे परिवार ने सभी पंथो के साधुओ को बराबर सम्मान दिया , परन्तु धार्मिक कट्टरता पूरी तरह समाप्त हो चुकी थी। पिताजी शंकर जी के भक्त थे तो माताजी हनुमान जी की , दादी जी यदा कदा माताजी/कुुु देवी के लिए दिया जलाती थी , तो दादाजी कभी माताजी को तो कभी ग्राम देवता को , सभी जैन धर्म कि पूजा पाठ से कोसो दूर थे। यद्दपि हमारे यहाँ जैनसाधु तो बहुत ठहरे पर मेरा घर "अभिशप्त" भी हो गया था परन्तु किसी साधू ने यह नहीं जाना और न कोई उपचार बताया या किया। केवल भाषणबाज साधुओ से मेरी दूरी का एक कारण यह भी था ! (अब भी मैं प्रवचन सुनने नहीं जाता क्योकि भगवान ने मुझे ही इतना ज्ञान दे दिया कि जरूरत ही नहीं किसी को "झेलने" की )
कालेज की शिक्षा के बाद , मै एक बड़े शहर में पढने आया , तो रिश्ते में फूफाजी की मदद से जैन दादाबाड़ी में रहने की व्यवस्था हुई। हालांकि वहा के लडको स मुझे कोई मतलब नहीं था क्योंकि मै एक अलग कोर्स करने आया था न कि कालेज की आगे की पढ़ाई। फिर भी एक गुंडे जैन लडके ने जिसका सम्बन्ध आर एस एस से भी था , ने अपने तथ्यो के साथ मेरी रैकिंग ली बहुत ही बुरा व्यवहार किया , डंडा भी लगाया। मै तो कालेज लाइफ के बाद भी एकदम सीधा सादा था , तिस पर पहली बार घर से अकेला निकला रहने और पढने को । फूफाजी की मदद से जैनसमाज के ट्रस्टियों से इसकी शिकायत की, उन्होंने कड़ी कार्यवाही का केवल आश्वासन दिया पर किया कुछ नहीं। मेरा दिमाग तो उस दिन इतना खराब हुआ था कि मै अहिंसक प्राणी रामपुरी चाक़ू खोज रहा था , ताकि उस जैन छोकरे के पेट में घोप दू और जैन समाज देखेगा कि उसके ही भवन में एक जैन ने दूसरे जैन की हत्या कर दी , तब अहिंसा परमो धर्म का भेद पूरी दुनिया के सामने खुलकर आ जाएगा। पर ये हो न सका शायद ईश्वर को यह मंजूर नहीं था। इस घटना से मुझे जैन समाज से विरक्त कर दिया। (घटना समय लगभग 1978 की )
समय बड़े बड़े घावो को भर देता है, ऐसा कहा जाता है । मुझे फिर खुजली हुई जैन समाज की सेवा करने को, कारण , सभी लोगो को देखता था अपने अपने समाज की सेवा करते , पक्ष लेते। तो मैंने सोंचा की न अपने समाज की सेवा की जाए , ताकि उन लोगो के परिवारो को जिनके यहाँ विविध कष्ट हो रहे है , मुझे ज्योतिष का सच्चा ज्ञान है और जीवन में हुई एक अजीब सी घटना के कारण गहन अध्यात्मिक ज्ञान भी हुआ दैव कृपा से। तो मैंने एक पुस्तक प्रकाशित किया। और वह भी बिना किसी सामाजिक सहायता के (क्योकि जैन समाज ड्रामा ज्यादा करता है , नाम बड़े दर्शन खोटे ब्रांड के पाये जाते है ). कुछेक लोगो ने मेरी भावना और कृति की प्रशंसा की, तो किसी ने बेइज्जती भी , कुछ तेरापंथी जैनो ने तो मेरी कुछ किताब भीड़ का फायदा उठाकर चुरा लिया , फिर भी मैंने मन साफ़ रखा आखिर माताजी की ही तो सेवा कर रहा हूं। दूसरे गोत्रो की कुलदेवियों का भी तो आशीर्वाद मुझे ही मिलेगा। पर एक तेरापंथी जैन तो मुझे कहने लगा कि यहाँ से हट जाओ , इस किताब में गलत बाते लिखी है ! आपत्तिजनक है ! मैंने ध्यान नहीं दिया क्योकि जो मैंने पाया था , वही लिखा . सालो मैं की बाते जानने के लिए अनेक सिद्ध पुरुषो के पास , ज्ञानियो के पास भटका (सभी सनातन धर्म के थे ). अनेक तर्क वितर्क किये , परीक्षाये उनकी ली , तब ही तो ज्ञान हुआ। अगले साल ओसवाल जाति का इतिहास मैंने पढ़ा , फिर सोंचा मैंने तो पढ़ लिया , पर अनेक दूसरे है जो यह सब पढ़ नहीं पाते और अपने इतिहास का ज्ञान ही नहीं होता , यह सोंचकर मैंने स्थानीय रूप से एक नए प्रकाशन "जीवन साथी" नामक पत्रिका में कुछ लेख लिखे ताकि नयी पीढी को कुछ जानकारी मिल सके। (सन २००० के आस पास की घटना )
और एक पम्पलेट भी अपने खर्चे से छपवाया बांटने को , पर महावीर जयंती के रोज कुछ कट्टरपंथी /तेरापंथी जैन समाज के लोग आकर झगड़ा करने लगे , पम्पलेट में गलत बाते लिखी है , जबकि पम्पलेट में जो संक्षिप्त इतिहास लिखा था वह सिर्फ इंटरनेट पर प्रकाशित जैन समाज के इतिहास का अंगरेजी से हिंदी में अनुवाद मात्र था। इतिहास किसी विद्वान ने ही लिखा होगा। जब यह झगड़ा चल रहा था तो
मंदिर-मार्गी जैन जिनके मंदिर /दादाबाड़ी में मै खडा था वहा तेरापंथियो की दादागिरी देखते चुपचाप , और मजा लेते खड़े थे . इस घटना से आहत हो कर मुझे वहा से जाना पड़ा , कुछ पम्पलेट भी उन कुत्तो ने जब्त कर लिया . इसके बाद मैंने जैन समाज के कार्यक्रमो में जाना , जैन मंदिर जाना , उत्सवो में शामिल होना पूरी तरह बंद कर दिया। मुझे ऐसा लगता है मानो एक सात्विक हिन्दू , मुस्लिम समाज के कार्यक्रम घुस जाए तो उसे महसूस होता है। धन्य है ईश्वर , जिसने मुझे सच्चाई का ज्ञान दिया और मुझे उस पाखंडी धर्म से बिलकुल दूर कर दिया , और नफ़रत भर दिया इस समाज से ! अब मै मुक्त महसूस करता हूँ , और जहा मे आस्था होती है , वहीँ श्रद्धा से जाता हूँ। (बीज जो डाला गया था, अब वह वृक्ष बन गया है, जो कट तो सकता है , पर वापस पौधा नहीं बन सकता ) . इस घटना के बाद कभी जैन आये ज्योतिषीय सलाह लेने मैंने मना कर दिया कि मैंने जैनियों की सेवा बंद कर दिया है। वैसे भी जैनियों के साथ काफ़ी कड़वा अनुभव हो चुका है , बनिया और कपटी समाज है ये , साथ ही संयोग से मैं स्वयं भी खुदा की गलती से जैन धर्म में पैदा होने से अनेक बार दूसरे समाज के लोगो से अपमानित भी हुआ जाने अनजाने में। की बार तो लोग मेरे सामने मारवाड़ियों को गाली देते थे , क्योकि उन्हें पता नहीं होता कि मै भी मारवाड़ी हूँ , बाद में पता चलता तो माफ़ी मांगते थे , परन्तु मै उन्हें जवाब देता था कि भाई तुम जो कह रहे हो वो तुम्हारा अनुभव ही है , बनिया कौम सचमुच ऐसा ही है , निपट स्वार्थी , किसी का नहीं। मेरा मारवाड़ी समाज ऐसा ही है इसलिए गालिया खाता है। ब्याजखोर , खून चूसनेवाला आदि तारीफ़ के शब्द अक्सर सुनने को मिलते ही है।
शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013
इतनी भी संवेदनशीलता ठीक नहीं !
एक बार विष्णु भैया नयी रेड शर्ट और क्रीम कलर की पेंट , जो नयी सिलवाकर पहने उए खड़े थे , कपडे के कलर और मैचिंग बेहद खिल रहा था , मैंने भी देखा तो तारीफ़ किये बगैर नहीं रहा। कुछ देर बाद मजाकिया बाबूलाल सोनी वहा से निकला , तो हंसते हुए भोला- क्या भैया "मड़ई " (मेला ) जाने की तैयारी है क्या ? बस यह तीर निशाने में लगा और विष्णु भैया तुरंत चल पड़े घर की और , शर्ट पेंट उतार कर दूसरी पहन कर वापस आ गए , उस नये कपडे को अपने बेटे को दे दिया जो उनके साइज का ही करीब करीब था। विष्णु भैया फिर कभी भी उसे नहीं पहने।
पाठको , ऐसी संवेदनशीलता यदि आपमें है तो उसे सुधार ले , कभी कभी ये बहुत नुकसानदेह होता है ,ऐसे लोगो का मजाक भी दूसरे लोग उड़ाते है मनोरंजन के लिये। "दूसरे क्या सोंचते है दूसरे क्या बोलेंगे " यह जरूरत से ज्यादा सोचनेवाला घाटे में ही रहेगा। केवल लक्ष्य की तरफ एकाग्रचित्त रहना ही अच्छा होता है।
मेरे मनोवैज्ञानिक शरारते -3
इसी देवधर शर्मा (मेरा मित्र) पर मैंने एक और प्रयोग किया -चूँकि वह हीन भावना से ग्रस्त था , आत्मविश्वास की कमी, क्यों कि दिखने में बदसूरत , हाईट के मामले में भी गरीब , आर्थिक स्थिति से भी गरीब , रंग में भी काला , पढ़ाई में भी कमजोर कुल मिलाकर सभी में कमी और फलस्वरूप आत्मविश्वास की बेहद कमी थी। मैंने एक लड़की की तरफ उसका खींचा और बरगलाने लगा वो तेरे लायक है , शायद तुझको चोरी छुपे देखती भी है , तुझे पसंद भी करती है , ऐसा सुनाने में आया है ! कुछ दिनों बाद वो तो जैसे बावला ही हो गया, रात्रि में सपने में उसे दिखाई देती थी , दिन रात उसी का ध्यान आते रहता था , क्लास में वो थी तो पढते वक्त चोरी छुपे उसे देखता रहता था। बाद में मैंने सोंचा , यह प्रयोग तो पूरी तरह सफल रहा अब चाकरी उलटी घुमानी पड़ेगी , अन्यथा पढ़ाई बरबाद हो जायेगी। मैंने उस लड़की के बारे में उलटी बाते कहना शुरू कर दिया जैसे वो कोई ख़ास नहीं, बकरी जैसे टाँगे , देखने में सुन्दर भी नहीं , वो ठहरी मराठी और तुम ब्राम्हण ,यानी संस्कार ही अलग अलग।, आदि। धीरे धीरे कुछ दिनों में उसकी तरफ का खिंचाव जो मैंने ही उसके मन में भरा था समाप्त हो गया। और वो लाइन में आ गया।
एक और प्रयोग मैंने किया था - नाम कमल गुप्ता पर। कालेज के दिनों में खूब करसत किया करता था , बाड़ी तो उसने अच्छी बनाए लिया , पर दिमाग घुटने में आ गया, पढ़ाई में ध्यान नहीं देता था । मेरे से दोस्ती होने के बाद , मैंने ध्यान दिया - उसके पिता जी की एक छोटी सी होटल थी , जैसे तैसे कमा कर घर चला रहे थे , कमल सबसे बड़ा लड़का था , बाकी भाई भी पढ़ रहे थे। ये जनाब , किस्से सुनाया करते थे कि कभी किसको पिटा किसको चाक़ू लेकर दौड़ाया , कितनी संख्या में बार कर लेता हूँ ,आदि।
मैंने सोंचा फिर धीरे धीरे उसी से प्रश्न करना शुरू कर दिया , कि तुम आगे क्या करना चाहोगे ? जैसे पढ़ाई खत्म हो जायेगी एक दो साल में फिर ?
उसने जवाब दिया किसी सेठ का अंगरक्षक (बाड़ी गार्ड ) बन जाउगा।
मैंने पूछा -फिर ?
फिर क्या ऐसा ही चलता रहेगा।
मैंने पूछा -कब तक? एक दिन दूसरा तुमसे ताकतवर मिल जाएगा , तो तुम्हे हटाकर , सेठ दूसरा रख लेगा ! कभी लड़ाई करते हाथ पैर टूट गया तो, इलाज भी वो बनिया शायद ही कराये ! फिर क्या करोगे ?
धीरे धीरे मैंने उसे भविष्य के बारे में सोंचने को मजबूर कर दिया , फिर मेरी सलाह से उसका ध्यान पढ़ाई में लगाने लगा। प्रोत्साहन मिलने से वह सीधा साधा हो गया। उसने बी.ए. के बाद एम. ए. भी कर लिया और शिक्षा विभाग में ही नौकरी मिल गयी। पीछे अपना घर भी सम्भाल लिया , अब उसके छोटे भाइयो ने बहुत छोटी सी होटल को बंद कर सायकल दूकान और फोटो स्टेट की दूकान खोल ली बड़े भाई की सहायता से। उसके पिटा जी को भी काफ़ी आराम मिला इससे। फिर छोटे भाइयो ने किराना दूकान भी खोला , अब उसके घर की गरीबी भी दूर हो चुकी थी !
पाठको, दोस्ती हमेशा काबिल लडको से करनी चाहिए , दोस्ती ही युवावस्था में भटकाती है , बिगाड़ती भी है , और केरियर बना भी देती है , एक अच्छा दोस्त बेहद कीमती होता है ! आगे जीवन में दोस्ती तो सिर्फ व्यवसायिक कारणो से ही होती है , जो स्वार्थ के आधार पर ही निर्भर करती है। छात्र जीवन की दोस्ती निस्वार्थ और भावनात्मक आधार पर होती है जो जीवन में फिर शायद कभी न मिले !! उसे सम्भाल कर सहेज कर रखना !
मेरी मनोवैज्ञानिक शरारते-2
कालेज के दिनों में ही अपनी समझ से मैंने कुछ प्रयोग किये एक लडके पर, नाम था उसका देवधर शर्मा । एक लड़का जो ब्राम्हण जाति का था , बीए में पढ़ता था , जबकि मैं बीकाम में था। यह लड़का बेहद हीन भावना से पीड़ित था , कि दो लडको के सामने खड़े होने से बात भी नहीं कर पाता था । कारण कई थे - १. गरीब परिवार से था ,२. रंग से काला , दुबला पतला , ऊंचाई में काफ़ी कम ,३. पढ़ाई में बेहद कमजोर। मेरे से दोस्ती होने के बाद मैंने उसे ठीक करने की सोंची . मैंने उसे इस तरह ठीक करने हेतु कदम उठाये -
१- मैंने उसे कहा कि कला में तुम पिछली सीट पर बैठते हो , इसकी बजाय तुम हर सप्ताह सीट बदला करो इससे उसे फ़ायदा हुआ। क्लास में जो कुछ पढ़ाया जाता था उसके दिमाग में घुसने लगा। जबकि पहले सबसे पीछे बैठने के कारण और एक ही सीट में बैठने से पढ़ाई दिमाग में नहीं घुसती थी
२- अब अगला कदम - मैंने उसे कहा,समझ में न आये तो प्रोफेसर से प्रश्न करने कहा , उसने कहा किसी ने हँस दिया तो? मैंने उसे दिलासा दिया कि जैसे पहले तुम अनुपस्थित दिमाग से रहते थे वैसे ही अन्य भी रहेंगे , अत: किसी को पता नहीं चलेगा, हंसना तो दूर। वह वैसा ही करने लगा। उसने वैसा ही किया ,इससे उसका आत्मविश्वास बढ़ने लगा और प्रोफेसर लोग उसको पहचानने लगे, नाम से भी । अब प्रश्न पूछने के लिए ज्ञान जरुरी होता है , जिसके लिए रूचि भी जरुरी है , अत: रूचि बढ़ने से उसे पढ़ाई करने में आनंद आने लगा। घर पर किताबे भी पढ़ने लगा .
३- स्टेटिस्टिक्स जैसे विषय में मैंने उसे मार्गदर्शन दिया तो वही ज्ञान कक्षा में उसे काम आया , अब अन्य लडको की नजर में और प्रोफ़ेसर की नजर में वह एक होशियार लड़का माना जाने लगा। इससे इज्जत बढ़ी और उसका आत्मविश्वास भी ! बाद में उसे कक्षा नायक भी बनाया गया।
धीरे धीरे उसका आत्मविश्वास इतना बढ़ गया कि जो कभी दो छात्रो के सामने भी नहीं बोल पाता था , वह स्टेज में एक हास्य नाटक में उतरा , और कमाल की एक्टिंग कर हंसाया , तो अनेक सहपाठी उसे अच्छी एक्टिंग के लिए बधाई देने गए। जिसे कक्षा में भी नहीं जानते थे वह पूरे कालेज में प्रसिद्द हो गया।गरीबी सम्बन्धी और बदसूरती सम्बन्धी हीन भावना भी मैंने उसके मन से निकालने में सफलता पायी
पढ़ाई पूरी करने के बाद उसने एम ए किया और ग्राम सचिव की सरकारी नौकरी पकड़ ली , फिर उसने डबल एम ए भी किया। इस प्रकार उसकी जिंदगी पूरी तरह बदल गयी। मैंने मित्रता निभाया एक अच्छे मित्र होने की हैसियत से .