तुलसी राम अपने पैरो पर खड़ा हो गया -
सन 1990 -91 की बात है , मै अपने रेडीमेड कपडे की दूकान में था ,है स्कूल में साथ पढ़ा हुआ एक पुराना सहपाठी मेरे पास आया-तुलसी राम। बहुत परेशानी की हालत में था , बातचीत करने से आभास हुआ कि उसमे सुसाईडिंग टेंडेंसी /आत्महत्या की प्रेरणा भी शायद आ रही है। उसने अपना दुखड़ा रोया, जब से कालेज से निकला हूँ ,अभी तक बेरोजगार हूँ।कई साल पहले शादी भी हो चुकी है ,बच्चे भी है। परन्तु कमाने का ठिकाना नहीं ,नौकरी भी मिलती नहीं , हालत एकदम खस्ता है। जेब में पैसे ही नहीं है।
मैंने मजाक में उससे कहा - आदिवासी हो , सरकार के दामाद , तुम्हे नहीं मिलेगी तो क्या हमें मिलेगी ?उसने जवाब दिया - भाई ये आरक्षण वगैरह का फ़ायदा तो नेताओ ,अफसरों के रिश्तेदारो को ही मिलता है ,हमें कौन पूछता है ! बस नाम का ही आरक्षण है। मैंने कहा -नौकरी न सही खेती तो है ? खेती किसानी करो , उसमे भी कमाई है। उसने जवाब दिया -सिर्फ तीन एकड़ ( या शायद 5 एकड़ ) है ,वह भी करना संभव नहीं। तब मैंने कहा खुद का धंधा कर लो। इस पर उसने जवाब दिया- धंधे के लिए दूकान और पूंजी चाहिए ,कहा से लाऊंगा ?यहाँ तो दस रुपये भी नहीं रहता।
मैंने दिया - पैसे से ज्यादा दिमाग की जरुरत होती है, दिमाग रहे तो मिट्टी से सोना बना सकते हो ,नहीं तो सोने को मिटटी में लोग बदल देते है बिना अकल के । फिर मैंने उसे व्यावसायिक उदाहरण /अकल दिया- तुम खाली टीन खरीदो फिर उसे बेचकर थोड़ा थोड़ा कमाना शुरू कर दो। उसने कहा खाली टिन खरीदने के भी पैसे नहीं है। मैंने तर्क दिया -तुम्हारी जान पहचान अपने गाँवों में तो होगा?एक दो टिन तो उधार ले सकते हो ,बेचकर पैसे दुकानदार को दे देना,धीरे धीरे विश्वास बन जाएगा । धंधा करना है तो शर्म लिहाज बिलकुल त्याग दो , कमाना लक्ष्य बना लो,पैसा कमाने में शर्म कैसी ,कोई चोरी या गलत काम थोड़ी कर रहे हो ?धंधा कर रहे हो। रही बात नौकरी की, तो कोई बनिया 800 /-रु. देकर नौकर रखेगा ,12 घंटे रगड़कर काम लेगा ,खून चूसेगा , खुद का कोई काम पडेगा तो छुट्टी देने में नाटक करेगा और पैसे भी काट लेगा। उसने अनेक "किन्तु परन्तु छाप" शंकाए प्रकट की। मैंने भी अपने इस सहपाठी के सभी शंकाओ का समाधान कर दिया। वह शांत दिमाग से मेरी दूकान से बाहर निकला। और खाली टिन बेचने का ही धंधा शुरू कर दिया , मेरे आइडिया के अनुसार।
समय बीता ,"मेरे समय" ने पलटा खाया, चलती दुकान एक हादसे के बाद बंद हुई ,पूंजी पूरी तरह नष्ट हो गयी और अपने ज्ञान व हुनर के बलबूते पर मुझे नौकरी में आना पड़ा। एक फैक्ट्री में नौकरी करने आया और मैनेजर बन गया। वहा तुलसीराम ट्रक भर खाली टिन लेकर आया , छँटाई के बाद पैसे लेने दूसरे दिन आने कहा गया। परन्तु बाहर का मामला था अत : उसी दिन पैसे देने का अनुरोध उसने किया , तिस पर सुपरवाइजर ने मैनेजर साहब से मिलने का सुझाव दिया। अब मैनेजर को पूछते हुए वह मेरे केबिन आया तो दोनों एक दूसरे को देखकर चौंक पड़े। इस संयोग की कल्पना न मुझे थी न उसे। दोनों बड़े प्रसन्न हुए , इतने वर्षो बाद मिलकर। फिर बातचीत करते अपनी पूरी कहानी बताई कि कैसे तुम्हारे दूकान से मै शांत दिमाग से उतरा और खाली टिन का ही धंधा शुरू किया। तुम्हारा (यानी मेरा)आइडिया ,भगवान की दया और उसकी खुद की मेहनत का ही परिणाम था कि उसकी गरीबी दूर हो गयी , अब ट्रको खाली टिन खरीदता और बेचता है। उसने यह भी बताया -आज जो कुछ भी है तुम्हारी सलाह के कारण। अच्छा हुआ कि मैंने नौकरी नहीं की , नहीं तो गरीबी कायम रहती (ऐसा उसने ही कहा ),और सिर्फ 800 /-से 1000/-रु में जूते घिस रहा होता ,जबकि अभी हर माह कम से कम 5000/-महीना मै कमा रहा हूँ ,कभी कभी 7000/-तक भी फ़ायदा हो जाता है। अब मेरे घर में सब कुछ है।
सन 1990 -91 की बात है , मै अपने रेडीमेड कपडे की दूकान में था ,है स्कूल में साथ पढ़ा हुआ एक पुराना सहपाठी मेरे पास आया-तुलसी राम। बहुत परेशानी की हालत में था , बातचीत करने से आभास हुआ कि उसमे सुसाईडिंग टेंडेंसी /आत्महत्या की प्रेरणा भी शायद आ रही है। उसने अपना दुखड़ा रोया, जब से कालेज से निकला हूँ ,अभी तक बेरोजगार हूँ।कई साल पहले शादी भी हो चुकी है ,बच्चे भी है। परन्तु कमाने का ठिकाना नहीं ,नौकरी भी मिलती नहीं , हालत एकदम खस्ता है। जेब में पैसे ही नहीं है।
मैंने मजाक में उससे कहा - आदिवासी हो , सरकार के दामाद , तुम्हे नहीं मिलेगी तो क्या हमें मिलेगी ?उसने जवाब दिया - भाई ये आरक्षण वगैरह का फ़ायदा तो नेताओ ,अफसरों के रिश्तेदारो को ही मिलता है ,हमें कौन पूछता है ! बस नाम का ही आरक्षण है। मैंने कहा -नौकरी न सही खेती तो है ? खेती किसानी करो , उसमे भी कमाई है। उसने जवाब दिया -सिर्फ तीन एकड़ ( या शायद 5 एकड़ ) है ,वह भी करना संभव नहीं। तब मैंने कहा खुद का धंधा कर लो। इस पर उसने जवाब दिया- धंधे के लिए दूकान और पूंजी चाहिए ,कहा से लाऊंगा ?यहाँ तो दस रुपये भी नहीं रहता।
मैंने दिया - पैसे से ज्यादा दिमाग की जरुरत होती है, दिमाग रहे तो मिट्टी से सोना बना सकते हो ,नहीं तो सोने को मिटटी में लोग बदल देते है बिना अकल के । फिर मैंने उसे व्यावसायिक उदाहरण /अकल दिया- तुम खाली टीन खरीदो फिर उसे बेचकर थोड़ा थोड़ा कमाना शुरू कर दो। उसने कहा खाली टिन खरीदने के भी पैसे नहीं है। मैंने तर्क दिया -तुम्हारी जान पहचान अपने गाँवों में तो होगा?एक दो टिन तो उधार ले सकते हो ,बेचकर पैसे दुकानदार को दे देना,धीरे धीरे विश्वास बन जाएगा । धंधा करना है तो शर्म लिहाज बिलकुल त्याग दो , कमाना लक्ष्य बना लो,पैसा कमाने में शर्म कैसी ,कोई चोरी या गलत काम थोड़ी कर रहे हो ?धंधा कर रहे हो। रही बात नौकरी की, तो कोई बनिया 800 /-रु. देकर नौकर रखेगा ,12 घंटे रगड़कर काम लेगा ,खून चूसेगा , खुद का कोई काम पडेगा तो छुट्टी देने में नाटक करेगा और पैसे भी काट लेगा। उसने अनेक "किन्तु परन्तु छाप" शंकाए प्रकट की। मैंने भी अपने इस सहपाठी के सभी शंकाओ का समाधान कर दिया। वह शांत दिमाग से मेरी दूकान से बाहर निकला। और खाली टिन बेचने का ही धंधा शुरू कर दिया , मेरे आइडिया के अनुसार।
समय बीता ,"मेरे समय" ने पलटा खाया, चलती दुकान एक हादसे के बाद बंद हुई ,पूंजी पूरी तरह नष्ट हो गयी और अपने ज्ञान व हुनर के बलबूते पर मुझे नौकरी में आना पड़ा। एक फैक्ट्री में नौकरी करने आया और मैनेजर बन गया। वहा तुलसीराम ट्रक भर खाली टिन लेकर आया , छँटाई के बाद पैसे लेने दूसरे दिन आने कहा गया। परन्तु बाहर का मामला था अत : उसी दिन पैसे देने का अनुरोध उसने किया , तिस पर सुपरवाइजर ने मैनेजर साहब से मिलने का सुझाव दिया। अब मैनेजर को पूछते हुए वह मेरे केबिन आया तो दोनों एक दूसरे को देखकर चौंक पड़े। इस संयोग की कल्पना न मुझे थी न उसे। दोनों बड़े प्रसन्न हुए , इतने वर्षो बाद मिलकर। फिर बातचीत करते अपनी पूरी कहानी बताई कि कैसे तुम्हारे दूकान से मै शांत दिमाग से उतरा और खाली टिन का ही धंधा शुरू किया। तुम्हारा (यानी मेरा)आइडिया ,भगवान की दया और उसकी खुद की मेहनत का ही परिणाम था कि उसकी गरीबी दूर हो गयी , अब ट्रको खाली टिन खरीदता और बेचता है। उसने यह भी बताया -आज जो कुछ भी है तुम्हारी सलाह के कारण। अच्छा हुआ कि मैंने नौकरी नहीं की , नहीं तो गरीबी कायम रहती (ऐसा उसने ही कहा ),और सिर्फ 800 /-से 1000/-रु में जूते घिस रहा होता ,जबकि अभी हर माह कम से कम 5000/-महीना मै कमा रहा हूँ ,कभी कभी 7000/-तक भी फ़ायदा हो जाता है। अब मेरे घर में सब कुछ है।
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