शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

इतनी भी संवेदनशीलता ठीक नहीं !

कुछ लोग बेहद संवेदनशील होते है , जरूरत से ज्यादा ! ऐसे लोग बार बार उपहास का पात्र भी बनते है . लोग ऐसे व्यक्तियो का मजाक भी उडाकर मजा लेते है।  एक थे विष्णु चौरसिया (नाम परिवर्तित ) . बेहद संवेदनशील , लोग मेरे बारे में क्या कहते है , क्या सोंचते है इसके बारे में बेहद चिंतित। एक होटल थी शानदार , अच्छी चलती थी।  एक बार उन्होंने अपनी होटल का रिनोवेशन(फिर से सजाना संवारना ) कराया।  शहर के अच्छे पेंटर से होटल में घुसते साथ दिखने वाली दिवार पर एयर इंडिया के महाराजा की तस्वीर बनवाई स्वागत करते हुए मुद्रा में। सबको पसंद आयी खासकर ग्राहको को।  यह नवीनीकरण वाकई अच्छा था।  कुछ ही दिनों के बाद मैंने देखा तो पाया, उस पेंटिंग को मिटा दिया गया था , मै आश्चर्यचकित था , इतना अच्छा पेंटिंग , पैसे खर्च करके काबिल पेंटर से बनवाया , क्यों मिटवा दिया ? पता लगाया तो हमारे ही बीच में उठने बैठने वाला बाबूलाल सोनी , जो बेहद मजाकिया स्वभाव का था , एक दिन वहा गया , और बड़ा खाते हुए पेंटिंग को ध्यान से देखने लगा , जानबूझकर मुस्कुराते हुए ! यह देख विष्णु जी ने पूछ क्या देख रहे वो बाबूलाल ? तो बाबूलाल ने हंसते हुए कहा - ये पेंटिंग यह कहते हुए बनवायी है क्या कि - "आ बड़ा भजिया खा" ? एयर इंडिया का महाराजा तो यही कहते हुए लग रहा है ! बस विष्णु जी को यह बात लग गयी , दूसरे दिन , पेंटर को बुलावा कर वापस मिटवा दिया .
                        एक बार विष्णु भैया  नयी रेड शर्ट और क्रीम कलर की पेंट , जो नयी सिलवाकर पहने उए खड़े थे , कपडे के कलर और मैचिंग बेहद खिल रहा था , मैंने भी देखा तो तारीफ़ किये बगैर नहीं रहा। कुछ देर बाद मजाकिया बाबूलाल सोनी वहा से निकला , तो हंसते हुए भोला- क्या भैया "मड़ई " (मेला ) जाने की तैयारी है क्या ? बस यह तीर निशाने में लगा और विष्णु भैया तुरंत चल पड़े घर की और , शर्ट पेंट उतार कर दूसरी पहन कर वापस आ गए , उस नये कपडे को अपने बेटे को दे दिया जो उनके साइज का ही करीब करीब था। विष्णु भैया फिर कभी भी उसे नहीं पहने।
             पाठको , ऐसी संवेदनशीलता यदि आपमें है तो उसे सुधार ले , कभी कभी ये बहुत नुकसानदेह होता है ,ऐसे लोगो का मजाक भी दूसरे लोग उड़ाते है मनोरंजन के लिये। "दूसरे क्या सोंचते है दूसरे क्या बोलेंगे "  यह जरूरत से ज्यादा सोचनेवाला घाटे में ही रहेगा।  केवल लक्ष्य की तरफ एकाग्रचित्त रहना ही अच्छा होता है।

मेरे मनोवैज्ञानिक शरारते -3

दोस्त बनाता भी है और बिगाड़ता भी है ! एक अच्छा दोस्त लाखो रुपये से ज्यादा कीमती होता है !!
                             इसी देवधर शर्मा (मेरा मित्र) पर मैंने  एक और प्रयोग किया -चूँकि वह हीन  भावना से ग्रस्त था , आत्मविश्वास की कमी, क्यों कि दिखने में बदसूरत , हाईट के मामले में भी गरीब , आर्थिक स्थिति से भी गरीब , रंग में भी काला , पढ़ाई में भी कमजोर  कुल मिलाकर सभी में कमी और फलस्वरूप आत्मविश्वास की बेहद  कमी थी।  मैंने एक  लड़की की तरफ उसका  खींचा और बरगलाने लगा वो तेरे लायक है , शायद तुझको चोरी छुपे देखती भी है , तुझे पसंद भी करती है , ऐसा सुनाने में आया है ! कुछ दिनों बाद वो तो जैसे बावला ही हो गया, रात्रि में सपने में उसे दिखाई देती थी , दिन रात उसी का ध्यान आते रहता था , क्लास में वो थी तो पढते वक्त चोरी छुपे उसे देखता रहता था।  बाद में मैंने  सोंचा , यह प्रयोग तो पूरी तरह सफल रहा अब चाकरी उलटी घुमानी पड़ेगी , अन्यथा पढ़ाई बरबाद हो जायेगी।  मैंने उस लड़की के बारे में उलटी बाते कहना शुरू कर दिया  जैसे वो कोई ख़ास नहीं, बकरी जैसे टाँगे , देखने में सुन्दर भी नहीं , वो ठहरी मराठी  और तुम ब्राम्हण ,यानी संस्कार ही अलग अलग।, आदि।  धीरे धीरे कुछ दिनों में उसकी तरफ का खिंचाव जो मैंने ही उसके मन में भरा था समाप्त हो गया। और वो लाइन में आ गया।
    एक और प्रयोग मैंने किया था - नाम कमल गुप्ता पर। कालेज के  दिनों में खूब करसत किया करता था , बाड़ी तो उसने अच्छी बनाए लिया  , पर दिमाग घुटने में आ गया, पढ़ाई में ध्यान नहीं देता था । मेरे से दोस्ती होने के बाद , मैंने  ध्यान दिया -  उसके पिता  जी की एक छोटी सी होटल थी , जैसे तैसे कमा कर घर चला रहे थे , कमल सबसे बड़ा लड़का था , बाकी भाई भी पढ़ रहे थे। ये जनाब , किस्से सुनाया करते थे कि कभी किसको पिटा किसको चाक़ू लेकर दौड़ाया , कितनी संख्या में बार कर लेता हूँ ,आदि।
 मैंने सोंचा फिर धीरे धीरे उसी से  प्रश्न करना शुरू कर दिया , कि तुम आगे क्या करना चाहोगे ? जैसे पढ़ाई खत्म हो जायेगी एक दो साल में फिर ?
उसने जवाब दिया किसी सेठ का अंगरक्षक (बाड़ी गार्ड ) बन जाउगा।
मैंने पूछा -फिर ?
फिर क्या ऐसा ही चलता रहेगा।
मैंने पूछा -कब तक? एक दिन दूसरा तुमसे ताकतवर मिल जाएगा , तो तुम्हे  हटाकर , सेठ दूसरा रख लेगा ! कभी लड़ाई करते हाथ पैर टूट गया तो, इलाज भी वो बनिया शायद ही कराये ! फिर क्या करोगे ?
                                    धीरे धीरे मैंने उसे भविष्य के बारे में सोंचने को मजबूर कर दिया , फिर मेरी सलाह से उसका ध्यान पढ़ाई में लगाने लगा।  प्रोत्साहन मिलने से वह सीधा साधा हो गया।  उसने बी.ए. के बाद एम. ए.  भी कर लिया और शिक्षा विभाग में ही नौकरी मिल गयी।  पीछे अपना घर भी सम्भाल लिया , अब उसके छोटे  भाइयो ने बहुत छोटी सी होटल को बंद कर  सायकल दूकान और फोटो स्टेट की दूकान खोल ली बड़े भाई की सहायता से। उसके पिटा जी को भी काफ़ी आराम मिला इससे। फिर छोटे भाइयो ने किराना दूकान भी खोला , अब उसके घर की गरीबी भी दूर हो चुकी थी !
                                         पाठको, दोस्ती हमेशा काबिल लडको से करनी चाहिए , दोस्ती ही युवावस्था में भटकाती है , बिगाड़ती भी है , और केरियर बना भी देती है , एक अच्छा दोस्त बेहद कीमती होता है ! आगे जीवन में दोस्ती तो सिर्फ व्यवसायिक कारणो से ही होती है , जो स्वार्थ के आधार पर ही निर्भर करती है। छात्र जीवन की दोस्ती निस्वार्थ और भावनात्मक आधार पर होती है जो जीवन में फिर शायद कभी न मिले !! उसे सम्भाल कर सहेज कर रखना !

मेरी मनोवैज्ञानिक शरारते-2

मेरी मनोवैज्ञानिक खुरापात-2
कालेज के दिनों में ही अपनी समझ से मैंने कुछ प्रयोग किये एक लडके पर, नाम था उसका देवधर शर्मा ।  एक लड़का जो ब्राम्हण जाति  का था  , बीए में पढ़ता था , जबकि मैं बीकाम में था। यह लड़का बेहद हीन भावना से पीड़ित था ,  कि दो लडको के सामने खड़े होने से बात भी नहीं कर पाता  था ।  कारण कई  थे - १. गरीब परिवार से था ,२. रंग से काला , दुबला पतला , ऊंचाई में काफ़ी कम ,३. पढ़ाई में बेहद कमजोर।  मेरे से दोस्ती होने के बाद मैंने उसे ठीक करने की सोंची . मैंने उसे इस तरह ठीक करने हेतु कदम उठाये -
१- मैंने उसे कहा कि कला में तुम पिछली सीट पर बैठते हो , इसकी बजाय तुम हर सप्ताह सीट बदला करो इससे उसे फ़ायदा हुआ।  क्लास में जो कुछ पढ़ाया जाता था उसके दिमाग में घुसने लगा। जबकि पहले सबसे पीछे बैठने के कारण और एक ही सीट  में बैठने से पढ़ाई दिमाग में नहीं घुसती थी
२- अब अगला कदम - मैंने उसे कहा,समझ में न आये तो प्रोफेसर से प्रश्न करने कहा , उसने  कहा किसी ने हँस दिया तो? मैंने उसे दिलासा दिया कि जैसे पहले तुम अनुपस्थित दिमाग से रहते थे वैसे ही अन्य भी रहेंगे , अत: किसी को पता नहीं चलेगा, हंसना तो दूर। वह वैसा ही करने लगा। उसने वैसा ही किया ,इससे उसका आत्मविश्वास बढ़ने लगा और प्रोफेसर लोग उसको पहचानने लगे, नाम से भी । अब प्रश्न पूछने के लिए ज्ञान जरुरी होता है , जिसके लिए रूचि भी जरुरी है , अत: रूचि बढ़ने से उसे पढ़ाई करने में आनंद  आने लगा। घर पर किताबे भी पढ़ने लगा . 
३- स्टेटिस्टिक्स जैसे विषय में मैंने उसे मार्गदर्शन दिया तो वही ज्ञान कक्षा में उसे काम आया , अब अन्य लडको की नजर में और प्रोफ़ेसर की नजर में  वह एक होशियार लड़का माना जाने लगा। इससे इज्जत बढ़ी और उसका आत्मविश्वास भी ! बाद में उसे कक्षा नायक भी बनाया गया। 
                                             धीरे धीरे उसका आत्मविश्वास इतना बढ़ गया कि जो कभी दो छात्रो के सामने भी नहीं बोल पाता  था , वह स्टेज में एक हास्य नाटक में उतरा , और कमाल की एक्टिंग कर हंसाया , तो अनेक सहपाठी उसे अच्छी एक्टिंग के लिए बधाई देने गए। जिसे कक्षा में भी नहीं जानते थे वह पूरे कालेज में प्रसिद्द हो गया।गरीबी सम्बन्धी और बदसूरती सम्बन्धी हीन भावना भी मैंने उसके मन से निकालने में सफलता पायी 
                                              पढ़ाई पूरी करने के बाद उसने एम ए  किया और ग्राम सचिव की सरकारी नौकरी पकड़ ली , फिर उसने डबल एम ए भी किया। इस प्रकार उसकी जिंदगी पूरी तरह बदल गयी। मैंने  मित्रता निभाया एक अच्छे मित्र होने की हैसियत से .


रविवार, 1 दिसंबर 2013

मेरी मनोवैज्ञानिक शरारतें -1

             युवा अवस्था से ही मुझे मन को समझने की एक दृष्टि सी मिल गयी थी पता नहीं कैसे यह क्षमता मुझमे आ गया। इसका प्रयोग अपने मनोरंजन के लिए भी और शरारते करने के लिए किया।  मैंने देखा कि किसी के सामने उबासी लिया जाए एक दो बार , तो थोड़े समय बाद सामने वाले को भी उबासी आने लगाती है।  कालेज के दिनों में मेरे अंग्रेजी के प्रोफ़ेसर को किसी स्टूडेंट के उबासी लेने पर डांट पड़ती थी। यह देख मुझे शरारत सूझी।  मैं सामने की सीट पर बैठता था , सो जब सर ब्लैक बोर्ड पर लिख रहे होते तो मैं पीछे देखते हुए जानबूझ  कर नकली उबासी लेता था , दूसरे स्टूडेंट स्वाभाविक रूप से मुझे देखते थे।  बस एक दो बार ऐसा करता फिर कोई न कोई उबासी जरूर अनजाने में ले ही लेता और प्रोफ़ेसर साहब से डाँट खा ही जाता , बेचारा।  किसी को समझ में नहीं आता मेरी यह शरारत।



                                                                   एक बार तो मैं ही खुद फंस गया , नाटक करते करते मुझे खुद को ही अनजाने में सचमुच उबासी आ गयी सर के सामने फिर डाँट पड़ी - फिर- फिर , मगरमच्छ की तरह मुंह फाड़ा !नींद आ रही तो जाओ मुंह धोकर आओ !   

                                  इसी उबासी की तरकीब का मैंने सीए आर्टिकलशिप करते हुए जोरदार प्रयोग किया। एक बड़ा व्यक्ति आफिस में एकाउंट का कार्य करने आने लगा , और मेरे सामने की टेबल में बैठने लगा। गर्मी के दिन थे और १२ बजे के बाद बॉस चले जाते थे।  मुझे शरारत सूझी , जानबूझकर जब भी वह मेरी और देखता मैं नकली उबासी लेता।  धीरे धीरे दो तीन बार ऐसा करने से उसे भी उबासी आने लगती और बाद में नींद सी आने लगने लगी . रोज मैं यह नौटंकी करता , रोज  उसे उबासी दिलाता , फिर वह सोने लगता। रोजाना नींद की आदत पड़ने लगी।  अब बात यहाँ तक हो गयी वह ११ बजे आता , मुश्किल से आधा घंटे बाद ही मेरे बिना उबासी के नाटक के सो जाता कुर्सी पर ही दो -तीन घंटे की नींद लेता। एक बार बॉस ने उस ने देख लिया , लांच में जाने के पहले।  उसे उठाया और कहा कि नींद आती है तो घर जाकर सो जाया करो , यहां  आफिस में नहीं सोना। उसने  जवाब दिया कि खाना खाकर आता हम और गर्मी के दिन है अतः नींद आ जाती है। महीने भर में वह एक हप्ते का भी काम नहीं कर पाया इसी मुए नींद की वजह से। उसे अंत तक मेरी शरारत समझ नहीं आयी।