मेरी मनोवैज्ञानिक खुरापात-2
कालेज के दिनों में ही अपनी समझ से मैंने कुछ प्रयोग किये एक लडके पर, नाम था उसका देवधर शर्मा । एक लड़का जो ब्राम्हण जाति का था , बीए में पढ़ता था , जबकि मैं बीकाम में था। यह लड़का बेहद हीन भावना से पीड़ित था , कि दो लडको के सामने खड़े होने से बात भी नहीं कर पाता था । कारण कई थे - १. गरीब परिवार से था ,२. रंग से काला , दुबला पतला , ऊंचाई में काफ़ी कम ,३. पढ़ाई में बेहद कमजोर। मेरे से दोस्ती होने के बाद मैंने उसे ठीक करने की सोंची . मैंने उसे इस तरह ठीक करने हेतु कदम उठाये -
१- मैंने उसे कहा कि कला में तुम पिछली सीट पर बैठते हो , इसकी बजाय तुम हर सप्ताह सीट बदला करो इससे उसे फ़ायदा हुआ। क्लास में जो कुछ पढ़ाया जाता था उसके दिमाग में घुसने लगा। जबकि पहले सबसे पीछे बैठने के कारण और एक ही सीट में बैठने से पढ़ाई दिमाग में नहीं घुसती थी
२- अब अगला कदम - मैंने उसे कहा,समझ में न आये तो प्रोफेसर से प्रश्न करने कहा , उसने कहा किसी ने हँस दिया तो? मैंने उसे दिलासा दिया कि जैसे पहले तुम अनुपस्थित दिमाग से रहते थे वैसे ही अन्य भी रहेंगे , अत: किसी को पता नहीं चलेगा, हंसना तो दूर। वह वैसा ही करने लगा। उसने वैसा ही किया ,इससे उसका आत्मविश्वास बढ़ने लगा और प्रोफेसर लोग उसको पहचानने लगे, नाम से भी । अब प्रश्न पूछने के लिए ज्ञान जरुरी होता है , जिसके लिए रूचि भी जरुरी है , अत: रूचि बढ़ने से उसे पढ़ाई करने में आनंद आने लगा। घर पर किताबे भी पढ़ने लगा .
३- स्टेटिस्टिक्स जैसे विषय में मैंने उसे मार्गदर्शन दिया तो वही ज्ञान कक्षा में उसे काम आया , अब अन्य लडको की नजर में और प्रोफ़ेसर की नजर में वह एक होशियार लड़का माना जाने लगा। इससे इज्जत बढ़ी और उसका आत्मविश्वास भी ! बाद में उसे कक्षा नायक भी बनाया गया।
धीरे धीरे उसका आत्मविश्वास इतना बढ़ गया कि जो कभी दो छात्रो के सामने भी नहीं बोल पाता था , वह स्टेज में एक हास्य नाटक में उतरा , और कमाल की एक्टिंग कर हंसाया , तो अनेक सहपाठी उसे अच्छी एक्टिंग के लिए बधाई देने गए। जिसे कक्षा में भी नहीं जानते थे वह पूरे कालेज में प्रसिद्द हो गया।गरीबी सम्बन्धी और बदसूरती सम्बन्धी हीन भावना भी मैंने उसके मन से निकालने में सफलता पायी
पढ़ाई पूरी करने के बाद उसने एम ए किया और ग्राम सचिव की सरकारी नौकरी पकड़ ली , फिर उसने डबल एम ए भी किया। इस प्रकार उसकी जिंदगी पूरी तरह बदल गयी। मैंने मित्रता निभाया एक अच्छे मित्र होने की हैसियत से .
कालेज के दिनों में ही अपनी समझ से मैंने कुछ प्रयोग किये एक लडके पर, नाम था उसका देवधर शर्मा । एक लड़का जो ब्राम्हण जाति का था , बीए में पढ़ता था , जबकि मैं बीकाम में था। यह लड़का बेहद हीन भावना से पीड़ित था , कि दो लडको के सामने खड़े होने से बात भी नहीं कर पाता था । कारण कई थे - १. गरीब परिवार से था ,२. रंग से काला , दुबला पतला , ऊंचाई में काफ़ी कम ,३. पढ़ाई में बेहद कमजोर। मेरे से दोस्ती होने के बाद मैंने उसे ठीक करने की सोंची . मैंने उसे इस तरह ठीक करने हेतु कदम उठाये -
१- मैंने उसे कहा कि कला में तुम पिछली सीट पर बैठते हो , इसकी बजाय तुम हर सप्ताह सीट बदला करो इससे उसे फ़ायदा हुआ। क्लास में जो कुछ पढ़ाया जाता था उसके दिमाग में घुसने लगा। जबकि पहले सबसे पीछे बैठने के कारण और एक ही सीट में बैठने से पढ़ाई दिमाग में नहीं घुसती थी
२- अब अगला कदम - मैंने उसे कहा,समझ में न आये तो प्रोफेसर से प्रश्न करने कहा , उसने कहा किसी ने हँस दिया तो? मैंने उसे दिलासा दिया कि जैसे पहले तुम अनुपस्थित दिमाग से रहते थे वैसे ही अन्य भी रहेंगे , अत: किसी को पता नहीं चलेगा, हंसना तो दूर। वह वैसा ही करने लगा। उसने वैसा ही किया ,इससे उसका आत्मविश्वास बढ़ने लगा और प्रोफेसर लोग उसको पहचानने लगे, नाम से भी । अब प्रश्न पूछने के लिए ज्ञान जरुरी होता है , जिसके लिए रूचि भी जरुरी है , अत: रूचि बढ़ने से उसे पढ़ाई करने में आनंद आने लगा। घर पर किताबे भी पढ़ने लगा .
३- स्टेटिस्टिक्स जैसे विषय में मैंने उसे मार्गदर्शन दिया तो वही ज्ञान कक्षा में उसे काम आया , अब अन्य लडको की नजर में और प्रोफ़ेसर की नजर में वह एक होशियार लड़का माना जाने लगा। इससे इज्जत बढ़ी और उसका आत्मविश्वास भी ! बाद में उसे कक्षा नायक भी बनाया गया।
धीरे धीरे उसका आत्मविश्वास इतना बढ़ गया कि जो कभी दो छात्रो के सामने भी नहीं बोल पाता था , वह स्टेज में एक हास्य नाटक में उतरा , और कमाल की एक्टिंग कर हंसाया , तो अनेक सहपाठी उसे अच्छी एक्टिंग के लिए बधाई देने गए। जिसे कक्षा में भी नहीं जानते थे वह पूरे कालेज में प्रसिद्द हो गया।गरीबी सम्बन्धी और बदसूरती सम्बन्धी हीन भावना भी मैंने उसके मन से निकालने में सफलता पायी
पढ़ाई पूरी करने के बाद उसने एम ए किया और ग्राम सचिव की सरकारी नौकरी पकड़ ली , फिर उसने डबल एम ए भी किया। इस प्रकार उसकी जिंदगी पूरी तरह बदल गयी। मैंने मित्रता निभाया एक अच्छे मित्र होने की हैसियत से .
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