बुधवार, 30 जुलाई 2014

कैलेण्डर रचना और शुभ अशुभ

कैलेण्डर रचना और शुभ अशुभ :-
प्राचीन काल में आदि-मानव के पास समय जानने का साधन नहीं था। उसने निरिक्षण किया कि चन्द्रमा का एक चक्कर (पूर्णिमा से पूर्णिमा तक ) 28 दिन का होता है। तब उन्होंने इसके चार बराबर बराबर भाग किये
( 7 X 4=28 ). प्रत्येक भाग (7 दिन) को सप्ताह नाम दिया।  फिर हर दिन को अलग अलग नाम उस काल के विद्वान व्यक्तियों के नाम पर रखा। इस प्रकार रविवार से शनिवार नाम रखे गए। ये हो सकता था की सोमवार का नाम गुरूवार और शनिवार का नाम सोमवार रखा जाता। अत: प्रकृति के समय को मोटे तौर पर इस ढंग से नापा गया और नामकरण किया गया।  अब ज़रा सोंचे कि सभी दिन तो एक समान है , फिर कौन सा दिन अच्छा या बुरा होना चाहिए ? या कड़ावार और शांतवार ,शुभ या अशुभ होना चाहिए ?इसलिए मुझे लगता है किसी वार/दिन  को शुभ और अशुभ बताना दरअसल धन्धेबाजी ही है , न कि वास्तविकता। 
                      दूसरी तरफ पश्चिमी देशो में इसी तरह सूर्य कैलेण्डर =१२ महीने(जन से दिस ) की रचना की गयी।  भारतीय कैलेण्डर चन्द्र और सूर्य कैलेण्डर को समायोजित काटते हुए बनाया गया है। 
             हर दिन ईश्वर ने ही रचना  की है ,मनुष्य ने केवल नामकरण ही किया है , इसलिए हर दिन शुभ ही होगा ,धंधेबाजों के चंगुल से दूर रहे !

रविवार, 20 जुलाई 2014

तुलसी राम अपने पैरो पर खड़ा हो गया

तुलसी राम अपने पैरो  पर खड़ा हो गया -
सन  1990 -91  की  बात है , मै अपने रेडीमेड कपडे की दूकान में  था ,है स्कूल में साथ पढ़ा हुआ एक पुराना सहपाठी मेरे पास आया-तुलसी राम। बहुत परेशानी की हालत में था , बातचीत करने से आभास हुआ कि  उसमे सुसाईडिंग टेंडेंसी /आत्महत्या की प्रेरणा भी शायद आ रही है।  उसने अपना दुखड़ा रोया, जब से कालेज से निकला हूँ ,अभी तक बेरोजगार हूँ।कई  साल पहले  शादी भी हो चुकी है  ,बच्चे भी है। परन्तु कमाने का ठिकाना नहीं ,नौकरी भी मिलती नहीं , हालत एकदम खस्ता है। जेब में पैसे ही नहीं है।
                           मैंने मजाक में उससे कहा - आदिवासी हो , सरकार के दामाद , तुम्हे नहीं मिलेगी तो क्या हमें मिलेगी ?उसने जवाब दिया - भाई ये आरक्षण वगैरह का फ़ायदा तो नेताओ ,अफसरों के रिश्तेदारो को ही मिलता है ,हमें कौन पूछता है ! बस नाम का ही आरक्षण है। मैंने कहा -नौकरी न सही खेती तो है ? खेती किसानी करो , उसमे भी कमाई है।  उसने जवाब दिया -सिर्फ तीन एकड़ ( या शायद 5  एकड़ ) है ,वह भी करना  संभव नहीं। तब मैंने कहा खुद का धंधा कर लो।  इस पर उसने जवाब दिया- धंधे के लिए दूकान और पूंजी चाहिए ,कहा से लाऊंगा ?यहाँ तो दस रुपये भी नहीं रहता।
                                    मैंने दिया - पैसे से ज्यादा दिमाग की जरुरत होती है, दिमाग रहे तो  मिट्टी से सोना बना सकते हो ,नहीं तो सोने को मिटटी में लोग बदल देते है बिना अकल के । फिर मैंने उसे व्यावसायिक उदाहरण /अकल दिया-  तुम खाली टीन  खरीदो फिर उसे बेचकर थोड़ा थोड़ा कमाना शुरू कर दो। उसने कहा खाली टिन  खरीदने के भी पैसे नहीं है। मैंने तर्क  दिया -तुम्हारी जान पहचान अपने गाँवों में तो होगा?एक दो टिन तो उधार  ले सकते हो ,बेचकर पैसे दुकानदार को दे देना,धीरे धीरे विश्वास बन जाएगा । धंधा करना है तो शर्म लिहाज  बिलकुल त्याग दो , कमाना लक्ष्य बना लो,पैसा कमाने में शर्म कैसी ,कोई चोरी या गलत काम थोड़ी कर रहे हो ?धंधा कर  रहे हो। रही बात नौकरी की, तो कोई बनिया 800 /-रु. देकर नौकर  रखेगा ,12 घंटे रगड़कर काम लेगा ,खून चूसेगा , खुद का कोई काम पडेगा तो  छुट्टी देने में नाटक करेगा और पैसे भी काट लेगा। उसने अनेक "किन्तु परन्तु छाप" शंकाए प्रकट की। मैंने भी अपने इस सहपाठी के सभी शंकाओ का  समाधान कर दिया। वह शांत  दिमाग से मेरी दूकान से बाहर निकला। और खाली टिन बेचने का ही धंधा शुरू कर दिया , मेरे आइडिया के अनुसार।
                                       समय बीता ,"मेरे समय" ने  पलटा खाया, चलती  दुकान एक हादसे के बाद बंद हुई ,पूंजी पूरी तरह नष्ट हो गयी और अपने ज्ञान व हुनर के बलबूते पर मुझे नौकरी में आना पड़ा। एक  फैक्ट्री में नौकरी करने  आया और मैनेजर बन  गया। वहा  तुलसीराम ट्रक भर खाली टिन लेकर आया , छँटाई के बाद पैसे लेने दूसरे दिन आने कहा  गया। परन्तु बाहर का मामला था अत :  उसी दिन पैसे देने का अनुरोध उसने किया , तिस पर सुपरवाइजर ने मैनेजर साहब से मिलने का  सुझाव दिया।  अब मैनेजर को पूछते हुए वह मेरे केबिन  आया तो दोनों एक दूसरे को देखकर चौंक पड़े। इस  संयोग की कल्पना न मुझे थी न उसे। दोनों बड़े प्रसन्न हुए , इतने वर्षो बाद मिलकर। फिर बातचीत करते अपनी पूरी कहानी बताई कि कैसे तुम्हारे दूकान से मै शांत दिमाग से उतरा और खाली टिन का ही धंधा शुरू किया। तुम्हारा (यानी मेरा)आइडिया ,भगवान की दया और उसकी खुद की मेहनत का ही परिणाम था कि  उसकी  गरीबी दूर हो गयी , अब ट्रको खाली टिन खरीदता और बेचता है। उसने यह भी बताया -आज जो कुछ भी है तुम्हारी सलाह के कारण। अच्छा हुआ कि मैंने  नौकरी नहीं की , नहीं तो गरीबी कायम रहती (ऐसा उसने ही कहा ),और सिर्फ 800 /-से 1000/-रु में जूते  घिस रहा होता ,जबकि अभी हर माह  कम से कम 5000/-महीना मै  कमा रहा हूँ ,कभी कभी 7000/-तक भी फ़ायदा हो जाता है। अब मेरे घर में सब कुछ है




शुक्रवार, 17 जनवरी 2014

और मै जैन समाज से दूर हो गया !

यद्धपि मैंने जैन धर्म में ही जन्म लिया , पर 'जैनिज़्म'  मुझमे ज़रा भी नहीं।  बल्कि अपने कटु अनुभवो के कारण अपने समाज से इतनी दूरी बन गयी ,सदा के लिये कि अब वापस पीछे लौटना सम्भव नहीं , धृणा हो गयी सदा के लिए। इसमे मेरा कोई दोष मुझे नहीं दीखता बल्कि इस बनिया समाज का ही है जो इतना खराब व्यवहार किया करता है। यह सब एक दिन में नहीं हुआ , की वर्षो की घटनाये है।
                              बहुत वर्ष पहले मेरे दादाजी नगरसेठ हुआ करते थे , जैन मंदिर के सामने ही घर हुआ करता था। शहर में एक ही स्थानकवासी जैन- हम लोग हुआ करते थे , बाकी सब मंदिरमार्गी थे , यानी मूर्तिपूजक ! परन्तु हमलोग समाज में, मंदिर में आया जाया करते थे। नगर में आधे से ज्यादा चोपड़ा लोग थे जिनकी बहुलता के कारण . एक बार चोपड़ा लोगो से  किसी  झगड़े के कारण हमारे परिवार को "जात बाहर " कर दिया . मेरी दादी बड़ी दबंग थी , झुकना तो जैसे उसने सीखा ही नहीं था। इसका प्रभाव यह हुआ कि हमारे परिवार ने मंदिर आना जाना बंद कर अपने में ही लीन हो गए , वैसे भी स्थानकवासी थे यानी घर पर ही पूजा पाठ। धीरे धीरे वैष्णव/सनातन धर्मी हो गए। परन्तु समाज की परवाह नहीं की , कारण राजनीतिक दृष्टि से मेरा परिवार ताकतवर था। और हम लोगों के संस्कार ही बदल गए। लगभग १५ वर्षो तक यह चला फिर धीरे धीरे चोपड़ा लोग ही झुक कर आने लगे बात करने की कोशिस करने लगे। फिर भी नयी पीढी समेत पुरानी पीढ़ी की आदते बदल चुकी थी। उन दिनों जैनसाधुओं के ठहरने की भी व्यवस्था नहीं थी , मंदिर के सामने घर हमारा ही होने के कारण , समाज वालो को ही उन्हें ठहराने हमारे परिवार की विनती करनी पड़ती। अब मंदिर मार्गी हो जा स्थानकवासी , या फिर तेरा पंथी , सभी साधुगण हमारे शहर से गुजरते , तो हमारे घर के सामने वाले हिस्से में ही ठहरते . मैंने बचपन से इन सभी साधुओ को देखा , और पंथविहीन बन गया।, क्योकि हमारे परिवार ने सभी पंथो के साधुओ को  बराबर सम्मान दिया , परन्तु धार्मिक कट्टरता पूरी तरह समाप्त हो चुकी थी।  पिताजी शंकर जी के भक्त थे तो माताजी हनुमान जी की , दादी जी यदा कदा माताजी/कुुु देवी के लिए दिया जलाती थी , तो दादाजी कभी माताजी को तो कभी ग्राम देवता को , सभी जैन धर्म कि पूजा पाठ से कोसो दूर थे। यद्दपि हमारे यहाँ जैनसाधु तो बहुत ठहरे पर मेरा घर "अभिशप्त" भी हो गया था परन्तु किसी साधू ने यह नहीं जाना और न कोई उपचार बताया या किया। केवल भाषणबाज साधुओ से  मेरी दूरी का एक कारण यह भी था ! (अब भी मैं प्रवचन सुनने नहीं जाता क्योकि भगवान ने मुझे ही इतना  ज्ञान  दे दिया कि जरूरत ही नहीं किसी को "झेलने" की )
                                    कालेज की शिक्षा के बाद , मै एक बड़े शहर में पढने आया , तो रिश्ते में फूफाजी की मदद से जैन दादाबाड़ी में रहने की व्यवस्था हुई। हालांकि वहा के लडको स मुझे कोई मतलब नहीं था क्योंकि मै एक अलग कोर्स करने आया था न कि कालेज की आगे की पढ़ाई।  फिर भी एक गुंडे जैन लडके ने जिसका सम्बन्ध  आर एस एस से भी था , ने अपने तथ्यो के साथ मेरी रैकिंग ली बहुत ही बुरा व्यवहार किया , डंडा भी लगाया।  मै तो कालेज लाइफ के बाद भी एकदम सीधा सादा था , तिस पर पहली बार घर से अकेला निकला रहने और पढने को । फूफाजी की मदद से जैनसमाज के ट्रस्टियों से इसकी शिकायत की, उन्होंने  कड़ी कार्यवाही का केवल आश्वासन दिया पर किया कुछ नहीं।  मेरा दिमाग तो उस दिन इतना खराब हुआ था कि मै अहिंसक प्राणी रामपुरी चाक़ू खोज रहा था , ताकि उस जैन छोकरे के पेट में घोप दू और जैन समाज देखेगा कि उसके ही भवन में एक जैन ने दूसरे जैन की हत्या कर दी , तब अहिंसा परमो धर्म का भेद पूरी दुनिया के सामने खुलकर आ जाएगा। पर ये हो न सका शायद ईश्वर को यह मंजूर नहीं था।  इस घटना से मुझे जैन समाज से विरक्त कर दिया। (घटना समय  लगभग 1978 की )
                                           समय बड़े बड़े घावो को भर देता है, ऐसा कहा जाता है । मुझे फिर खुजली हुई जैन समाज की सेवा करने को, कारण , सभी लोगो को देखता था अपने अपने समाज की सेवा करते , पक्ष लेते।  तो मैंने सोंचा की न अपने समाज की सेवा की जाए , ताकि उन लोगो के परिवारो को जिनके यहाँ विविध कष्ट हो रहे है , मुझे ज्योतिष का सच्चा ज्ञान है और जीवन में हुई एक अजीब सी घटना के कारण गहन अध्यात्मिक ज्ञान भी हुआ दैव कृपा से। तो मैंने एक पुस्तक प्रकाशित किया।  और वह भी बिना किसी सामाजिक सहायता के (क्योकि जैन समाज ड्रामा ज्यादा करता है , नाम बड़े दर्शन खोटे  ब्रांड के पाये जाते है ). कुछेक लोगो ने मेरी भावना और कृति की प्रशंसा की, तो किसी ने बेइज्जती भी , कुछ तेरापंथी जैनो ने तो मेरी कुछ किताब भीड़ का फायदा उठाकर चुरा लिया , फिर भी मैंने मन साफ़ रखा आखिर माताजी की ही तो सेवा कर रहा हूं। दूसरे गोत्रो की कुलदेवियों का भी तो आशीर्वाद मुझे ही मिलेगा। पर एक तेरापंथी जैन तो मुझे कहने लगा कि यहाँ से हट जाओ , इस किताब में गलत बाते लिखी है ! आपत्तिजनक है ! मैंने ध्यान नहीं दिया क्योकि जो मैंने पाया था , वही लिखा . सालो मैं की बाते जानने के लिए अनेक सिद्ध पुरुषो  के पास , ज्ञानियो के पास भटका (सभी सनातन धर्म के थे ). अनेक तर्क वितर्क  किये , परीक्षाये उनकी ली , तब ही तो ज्ञान हुआ। अगले साल ओसवाल जाति  का इतिहास मैंने पढ़ा , फिर सोंचा मैंने तो पढ़ लिया , पर अनेक दूसरे है जो यह सब पढ़ नहीं पाते और अपने इतिहास का ज्ञान ही नहीं होता , यह सोंचकर मैंने स्थानीय रूप से एक नए प्रकाशन "जीवन साथी" नामक पत्रिका में कुछ लेख लिखे ताकि नयी पीढी को कुछ जानकारी मिल सके। (सन २००० के आस पास की घटना )
                                         और एक पम्पलेट भी अपने खर्चे से छपवाया बांटने को , पर महावीर जयंती के रोज कुछ कट्टरपंथी /तेरापंथी जैन समाज के लोग आकर झगड़ा करने लगे , पम्पलेट में गलत बाते लिखी है , जबकि पम्पलेट में जो संक्षिप्त इतिहास लिखा था वह सिर्फ इंटरनेट पर प्रकाशित जैन समाज के इतिहास का अंगरेजी से हिंदी में अनुवाद मात्र था। इतिहास किसी विद्वान ने ही लिखा होगा। जब यह झगड़ा चल रहा था तो
मंदिर-मार्गी जैन जिनके  मंदिर /दादाबाड़ी में मै खडा था वहा  तेरापंथियो की दादागिरी देखते चुपचाप , और मजा लेते खड़े  थे . इस घटना से आहत हो कर मुझे वहा से जाना पड़ा , कुछ पम्पलेट भी उन कुत्तो ने जब्त कर लिया . इसके बाद मैंने जैन समाज के कार्यक्रमो में जाना , जैन मंदिर जाना , उत्सवो में शामिल होना पूरी तरह बंद कर दिया। मुझे  ऐसा लगता है मानो एक सात्विक हिन्दू , मुस्लिम समाज के कार्यक्रम घुस जाए तो उसे महसूस होता है। धन्य है ईश्वर , जिसने मुझे सच्चाई का ज्ञान दिया और मुझे उस पाखंडी धर्म से बिलकुल दूर कर दिया , और नफ़रत भर दिया इस समाज से ! अब मै मुक्त महसूस करता हूँ , और जहा मे आस्था होती है , वहीँ श्रद्धा से जाता हूँ। (बीज  जो डाला गया था, अब वह वृक्ष बन गया है, जो कट तो सकता है , पर वापस पौधा नहीं बन सकता ) . इस घटना के बाद कभी जैन आये ज्योतिषीय सलाह लेने  मैंने मना कर दिया कि मैंने जैनियों की सेवा बंद कर दिया है। वैसे भी जैनियों के साथ काफ़ी कड़वा अनुभव हो चुका है , बनिया और कपटी समाज है ये , साथ ही संयोग से मैं स्वयं भी खुदा की गलती से जैन धर्म में पैदा होने से अनेक बार दूसरे   समाज के लोगो से अपमानित भी हुआ  जाने अनजाने में।  की बार तो लोग मेरे सामने मारवाड़ियों को गाली देते थे , क्योकि उन्हें पता नहीं होता कि मै भी मारवाड़ी हूँ , बाद में पता चलता तो माफ़ी मांगते थे , परन्तु मै उन्हें जवाब देता था कि भाई तुम जो कह रहे हो वो तुम्हारा अनुभव ही है , बनिया कौम सचमुच ऐसा ही है , निपट स्वार्थी , किसी का नहीं। मेरा मारवाड़ी समाज ऐसा ही है इसलिए गालिया खाता है।  ब्याजखोर , खून चूसनेवाला आदि तारीफ़ के शब्द अक्सर सुनने को मिलते ही है।