शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

इतनी भी संवेदनशीलता ठीक नहीं !

कुछ लोग बेहद संवेदनशील होते है , जरूरत से ज्यादा ! ऐसे लोग बार बार उपहास का पात्र भी बनते है . लोग ऐसे व्यक्तियो का मजाक भी उडाकर मजा लेते है।  एक थे विष्णु चौरसिया (नाम परिवर्तित ) . बेहद संवेदनशील , लोग मेरे बारे में क्या कहते है , क्या सोंचते है इसके बारे में बेहद चिंतित। एक होटल थी शानदार , अच्छी चलती थी।  एक बार उन्होंने अपनी होटल का रिनोवेशन(फिर से सजाना संवारना ) कराया।  शहर के अच्छे पेंटर से होटल में घुसते साथ दिखने वाली दिवार पर एयर इंडिया के महाराजा की तस्वीर बनवाई स्वागत करते हुए मुद्रा में। सबको पसंद आयी खासकर ग्राहको को।  यह नवीनीकरण वाकई अच्छा था।  कुछ ही दिनों के बाद मैंने देखा तो पाया, उस पेंटिंग को मिटा दिया गया था , मै आश्चर्यचकित था , इतना अच्छा पेंटिंग , पैसे खर्च करके काबिल पेंटर से बनवाया , क्यों मिटवा दिया ? पता लगाया तो हमारे ही बीच में उठने बैठने वाला बाबूलाल सोनी , जो बेहद मजाकिया स्वभाव का था , एक दिन वहा गया , और बड़ा खाते हुए पेंटिंग को ध्यान से देखने लगा , जानबूझकर मुस्कुराते हुए ! यह देख विष्णु जी ने पूछ क्या देख रहे वो बाबूलाल ? तो बाबूलाल ने हंसते हुए कहा - ये पेंटिंग यह कहते हुए बनवायी है क्या कि - "आ बड़ा भजिया खा" ? एयर इंडिया का महाराजा तो यही कहते हुए लग रहा है ! बस विष्णु जी को यह बात लग गयी , दूसरे दिन , पेंटर को बुलावा कर वापस मिटवा दिया .
                        एक बार विष्णु भैया  नयी रेड शर्ट और क्रीम कलर की पेंट , जो नयी सिलवाकर पहने उए खड़े थे , कपडे के कलर और मैचिंग बेहद खिल रहा था , मैंने भी देखा तो तारीफ़ किये बगैर नहीं रहा। कुछ देर बाद मजाकिया बाबूलाल सोनी वहा से निकला , तो हंसते हुए भोला- क्या भैया "मड़ई " (मेला ) जाने की तैयारी है क्या ? बस यह तीर निशाने में लगा और विष्णु भैया तुरंत चल पड़े घर की और , शर्ट पेंट उतार कर दूसरी पहन कर वापस आ गए , उस नये कपडे को अपने बेटे को दे दिया जो उनके साइज का ही करीब करीब था। विष्णु भैया फिर कभी भी उसे नहीं पहने।
             पाठको , ऐसी संवेदनशीलता यदि आपमें है तो उसे सुधार ले , कभी कभी ये बहुत नुकसानदेह होता है ,ऐसे लोगो का मजाक भी दूसरे लोग उड़ाते है मनोरंजन के लिये। "दूसरे क्या सोंचते है दूसरे क्या बोलेंगे "  यह जरूरत से ज्यादा सोचनेवाला घाटे में ही रहेगा।  केवल लक्ष्य की तरफ एकाग्रचित्त रहना ही अच्छा होता है।

मेरे मनोवैज्ञानिक शरारते -3

दोस्त बनाता भी है और बिगाड़ता भी है ! एक अच्छा दोस्त लाखो रुपये से ज्यादा कीमती होता है !!
                             इसी देवधर शर्मा (मेरा मित्र) पर मैंने  एक और प्रयोग किया -चूँकि वह हीन  भावना से ग्रस्त था , आत्मविश्वास की कमी, क्यों कि दिखने में बदसूरत , हाईट के मामले में भी गरीब , आर्थिक स्थिति से भी गरीब , रंग में भी काला , पढ़ाई में भी कमजोर  कुल मिलाकर सभी में कमी और फलस्वरूप आत्मविश्वास की बेहद  कमी थी।  मैंने एक  लड़की की तरफ उसका  खींचा और बरगलाने लगा वो तेरे लायक है , शायद तुझको चोरी छुपे देखती भी है , तुझे पसंद भी करती है , ऐसा सुनाने में आया है ! कुछ दिनों बाद वो तो जैसे बावला ही हो गया, रात्रि में सपने में उसे दिखाई देती थी , दिन रात उसी का ध्यान आते रहता था , क्लास में वो थी तो पढते वक्त चोरी छुपे उसे देखता रहता था।  बाद में मैंने  सोंचा , यह प्रयोग तो पूरी तरह सफल रहा अब चाकरी उलटी घुमानी पड़ेगी , अन्यथा पढ़ाई बरबाद हो जायेगी।  मैंने उस लड़की के बारे में उलटी बाते कहना शुरू कर दिया  जैसे वो कोई ख़ास नहीं, बकरी जैसे टाँगे , देखने में सुन्दर भी नहीं , वो ठहरी मराठी  और तुम ब्राम्हण ,यानी संस्कार ही अलग अलग।, आदि।  धीरे धीरे कुछ दिनों में उसकी तरफ का खिंचाव जो मैंने ही उसके मन में भरा था समाप्त हो गया। और वो लाइन में आ गया।
    एक और प्रयोग मैंने किया था - नाम कमल गुप्ता पर। कालेज के  दिनों में खूब करसत किया करता था , बाड़ी तो उसने अच्छी बनाए लिया  , पर दिमाग घुटने में आ गया, पढ़ाई में ध्यान नहीं देता था । मेरे से दोस्ती होने के बाद , मैंने  ध्यान दिया -  उसके पिता  जी की एक छोटी सी होटल थी , जैसे तैसे कमा कर घर चला रहे थे , कमल सबसे बड़ा लड़का था , बाकी भाई भी पढ़ रहे थे। ये जनाब , किस्से सुनाया करते थे कि कभी किसको पिटा किसको चाक़ू लेकर दौड़ाया , कितनी संख्या में बार कर लेता हूँ ,आदि।
 मैंने सोंचा फिर धीरे धीरे उसी से  प्रश्न करना शुरू कर दिया , कि तुम आगे क्या करना चाहोगे ? जैसे पढ़ाई खत्म हो जायेगी एक दो साल में फिर ?
उसने जवाब दिया किसी सेठ का अंगरक्षक (बाड़ी गार्ड ) बन जाउगा।
मैंने पूछा -फिर ?
फिर क्या ऐसा ही चलता रहेगा।
मैंने पूछा -कब तक? एक दिन दूसरा तुमसे ताकतवर मिल जाएगा , तो तुम्हे  हटाकर , सेठ दूसरा रख लेगा ! कभी लड़ाई करते हाथ पैर टूट गया तो, इलाज भी वो बनिया शायद ही कराये ! फिर क्या करोगे ?
                                    धीरे धीरे मैंने उसे भविष्य के बारे में सोंचने को मजबूर कर दिया , फिर मेरी सलाह से उसका ध्यान पढ़ाई में लगाने लगा।  प्रोत्साहन मिलने से वह सीधा साधा हो गया।  उसने बी.ए. के बाद एम. ए.  भी कर लिया और शिक्षा विभाग में ही नौकरी मिल गयी।  पीछे अपना घर भी सम्भाल लिया , अब उसके छोटे  भाइयो ने बहुत छोटी सी होटल को बंद कर  सायकल दूकान और फोटो स्टेट की दूकान खोल ली बड़े भाई की सहायता से। उसके पिटा जी को भी काफ़ी आराम मिला इससे। फिर छोटे भाइयो ने किराना दूकान भी खोला , अब उसके घर की गरीबी भी दूर हो चुकी थी !
                                         पाठको, दोस्ती हमेशा काबिल लडको से करनी चाहिए , दोस्ती ही युवावस्था में भटकाती है , बिगाड़ती भी है , और केरियर बना भी देती है , एक अच्छा दोस्त बेहद कीमती होता है ! आगे जीवन में दोस्ती तो सिर्फ व्यवसायिक कारणो से ही होती है , जो स्वार्थ के आधार पर ही निर्भर करती है। छात्र जीवन की दोस्ती निस्वार्थ और भावनात्मक आधार पर होती है जो जीवन में फिर शायद कभी न मिले !! उसे सम्भाल कर सहेज कर रखना !

मेरी मनोवैज्ञानिक शरारते-2

मेरी मनोवैज्ञानिक खुरापात-2
कालेज के दिनों में ही अपनी समझ से मैंने कुछ प्रयोग किये एक लडके पर, नाम था उसका देवधर शर्मा ।  एक लड़का जो ब्राम्हण जाति  का था  , बीए में पढ़ता था , जबकि मैं बीकाम में था। यह लड़का बेहद हीन भावना से पीड़ित था ,  कि दो लडको के सामने खड़े होने से बात भी नहीं कर पाता  था ।  कारण कई  थे - १. गरीब परिवार से था ,२. रंग से काला , दुबला पतला , ऊंचाई में काफ़ी कम ,३. पढ़ाई में बेहद कमजोर।  मेरे से दोस्ती होने के बाद मैंने उसे ठीक करने की सोंची . मैंने उसे इस तरह ठीक करने हेतु कदम उठाये -
१- मैंने उसे कहा कि कला में तुम पिछली सीट पर बैठते हो , इसकी बजाय तुम हर सप्ताह सीट बदला करो इससे उसे फ़ायदा हुआ।  क्लास में जो कुछ पढ़ाया जाता था उसके दिमाग में घुसने लगा। जबकि पहले सबसे पीछे बैठने के कारण और एक ही सीट  में बैठने से पढ़ाई दिमाग में नहीं घुसती थी
२- अब अगला कदम - मैंने उसे कहा,समझ में न आये तो प्रोफेसर से प्रश्न करने कहा , उसने  कहा किसी ने हँस दिया तो? मैंने उसे दिलासा दिया कि जैसे पहले तुम अनुपस्थित दिमाग से रहते थे वैसे ही अन्य भी रहेंगे , अत: किसी को पता नहीं चलेगा, हंसना तो दूर। वह वैसा ही करने लगा। उसने वैसा ही किया ,इससे उसका आत्मविश्वास बढ़ने लगा और प्रोफेसर लोग उसको पहचानने लगे, नाम से भी । अब प्रश्न पूछने के लिए ज्ञान जरुरी होता है , जिसके लिए रूचि भी जरुरी है , अत: रूचि बढ़ने से उसे पढ़ाई करने में आनंद  आने लगा। घर पर किताबे भी पढ़ने लगा . 
३- स्टेटिस्टिक्स जैसे विषय में मैंने उसे मार्गदर्शन दिया तो वही ज्ञान कक्षा में उसे काम आया , अब अन्य लडको की नजर में और प्रोफ़ेसर की नजर में  वह एक होशियार लड़का माना जाने लगा। इससे इज्जत बढ़ी और उसका आत्मविश्वास भी ! बाद में उसे कक्षा नायक भी बनाया गया। 
                                             धीरे धीरे उसका आत्मविश्वास इतना बढ़ गया कि जो कभी दो छात्रो के सामने भी नहीं बोल पाता  था , वह स्टेज में एक हास्य नाटक में उतरा , और कमाल की एक्टिंग कर हंसाया , तो अनेक सहपाठी उसे अच्छी एक्टिंग के लिए बधाई देने गए। जिसे कक्षा में भी नहीं जानते थे वह पूरे कालेज में प्रसिद्द हो गया।गरीबी सम्बन्धी और बदसूरती सम्बन्धी हीन भावना भी मैंने उसके मन से निकालने में सफलता पायी 
                                              पढ़ाई पूरी करने के बाद उसने एम ए  किया और ग्राम सचिव की सरकारी नौकरी पकड़ ली , फिर उसने डबल एम ए भी किया। इस प्रकार उसकी जिंदगी पूरी तरह बदल गयी। मैंने  मित्रता निभाया एक अच्छे मित्र होने की हैसियत से .


रविवार, 1 दिसंबर 2013

मेरी मनोवैज्ञानिक शरारतें -1

             युवा अवस्था से ही मुझे मन को समझने की एक दृष्टि सी मिल गयी थी पता नहीं कैसे यह क्षमता मुझमे आ गया। इसका प्रयोग अपने मनोरंजन के लिए भी और शरारते करने के लिए किया।  मैंने देखा कि किसी के सामने उबासी लिया जाए एक दो बार , तो थोड़े समय बाद सामने वाले को भी उबासी आने लगाती है।  कालेज के दिनों में मेरे अंग्रेजी के प्रोफ़ेसर को किसी स्टूडेंट के उबासी लेने पर डांट पड़ती थी। यह देख मुझे शरारत सूझी।  मैं सामने की सीट पर बैठता था , सो जब सर ब्लैक बोर्ड पर लिख रहे होते तो मैं पीछे देखते हुए जानबूझ  कर नकली उबासी लेता था , दूसरे स्टूडेंट स्वाभाविक रूप से मुझे देखते थे।  बस एक दो बार ऐसा करता फिर कोई न कोई उबासी जरूर अनजाने में ले ही लेता और प्रोफ़ेसर साहब से डाँट खा ही जाता , बेचारा।  किसी को समझ में नहीं आता मेरी यह शरारत।



                                                                   एक बार तो मैं ही खुद फंस गया , नाटक करते करते मुझे खुद को ही अनजाने में सचमुच उबासी आ गयी सर के सामने फिर डाँट पड़ी - फिर- फिर , मगरमच्छ की तरह मुंह फाड़ा !नींद आ रही तो जाओ मुंह धोकर आओ !   

                                  इसी उबासी की तरकीब का मैंने सीए आर्टिकलशिप करते हुए जोरदार प्रयोग किया। एक बड़ा व्यक्ति आफिस में एकाउंट का कार्य करने आने लगा , और मेरे सामने की टेबल में बैठने लगा। गर्मी के दिन थे और १२ बजे के बाद बॉस चले जाते थे।  मुझे शरारत सूझी , जानबूझकर जब भी वह मेरी और देखता मैं नकली उबासी लेता।  धीरे धीरे दो तीन बार ऐसा करने से उसे भी उबासी आने लगती और बाद में नींद सी आने लगने लगी . रोज मैं यह नौटंकी करता , रोज  उसे उबासी दिलाता , फिर वह सोने लगता। रोजाना नींद की आदत पड़ने लगी।  अब बात यहाँ तक हो गयी वह ११ बजे आता , मुश्किल से आधा घंटे बाद ही मेरे बिना उबासी के नाटक के सो जाता कुर्सी पर ही दो -तीन घंटे की नींद लेता। एक बार बॉस ने उस ने देख लिया , लांच में जाने के पहले।  उसे उठाया और कहा कि नींद आती है तो घर जाकर सो जाया करो , यहां  आफिस में नहीं सोना। उसने  जवाब दिया कि खाना खाकर आता हम और गर्मी के दिन है अतः नींद आ जाती है। महीने भर में वह एक हप्ते का भी काम नहीं कर पाया इसी मुए नींद की वजह से। उसे अंत तक मेरी शरारत समझ नहीं आयी।

बुधवार, 20 नवंबर 2013

सरवाइकल स्पांडोलिसिस पर होमियोपैथी भारी

सरवाइकल स्पांडोलिसिस पर होमियोपैथी भारी 
आधुनिकता की देंन  है सरवाइकल स्पांडोलिसिस , यानी गर्दन में दर्द, जकड़न ! मानसिक कार्य करने वालो, झुक कर काम करने वालो , टेबल कार्य करने वालो , घर की महिलाओ को, जिन्हे गर्दन झुका कर अनाज साफ़ करने आदि कार्य करना पडता है , उन्हें अक्सर होता है।  फिर फिजिओथेरपी के चक्कर , ढेरो क्रीम , दवाइयो का प्रयोग होने लगता है। मेरी गर्दन में दर्द हुआ तो हड्डी रोग विशेषयज्ञ के पास जा पहुंचा।  गर्दन में लगाने की क्रीम आदि दिया , कुछ दवाइया भी लिख दी , पर कोई लाभ नहीं मिला। फिर एक्सरे करवाया , कुछ खास नहीं निकला। की साल इससे भी भुगतते रहा।  फिर विवेकानंद आश्रम रायपुर में ट्रेक्शन की बार दिया गया , इससे कुछ  राहत मिला , फिर मैंने ही ट्रेक्शन दने के लिए घर पर ही जुगाड़ कर लिया , इससे बहुत राहत मिली।  इसी बीच धर्म पत्नी को भी काफ़ी समय से गर्दन दर्द हो रहा था। ट्रेक्शन आदि जारी था। दवाइया आदि जारी थी पर विशेष लाभ नहीं हुआ।  इसी बीच होमिओपैथी पढते मैंने दवाइया खोज निकाली।  मैंने पत्नी को कहा कि मै दवाई दे ददूं ? पर उसने " नीम  हकीम खरे जान " कहकर ठुकरा दिया , आखिर महीनो बाद भुगतते " मरती क्या न करती " वाली स्थिति में तैयार हुई।  तीन दिन सबेरे एक डोज मैंने दिया।  पहले दिन  से ही दर्द काफ़ी कम हो गया।  तीसरे दिन तो नामो निशाँ न रहा।  गले ने पट्टा बांधना बंद हो गया। अगले सप्ताह फिर हल्का सा महसूस होने लगा।  मैंने दवाइया दुहरायी , फिर तो हमेशा क लिए ठीक हो गया , जबकि एक्सरे वगैरह करके डाक्टरो ने गर्दन की हड्डी में कुछ गैप बताया था। तो दोस्तों मेरे अनुभव से सर्वाइकल स्पाण्डोलिसिस यानी गर्दन दर्द का सबसे अच्छा उपचार होमियोपैथी में है , इसके बाद ट्रेक्शन (फिजियोथेरेपी  ) ही है। , अगर आप परेशान हो इससे चूँकि आप सभी इंटरनेट चलाने के आदि है , यानी मानसिक कार्य , तो ये होने की सम्भावना है , तो यही इलाज अजमाए , बाकी सब ऑइंटमेंट , गोलिया , कैप्सूल आदि तो दुकानदारी है।

मंगलवार, 19 नवंबर 2013

मेरे बचपन का चुनावी अनुभव

मेरे बचपन का चुनावी अनुभव:
उन दिनों मैं कालेज में पढ़ता था , नगरपालिका का चुनाव आ गया था।  पड़ोस के 'काकाजी' पुनः चुनाव में खड़े हुए थे।  वैसे पहले से वे पार्षद थे।  इस बार कांग्रेस से हमेंशा की तरह टिकट मिली थी , चुनाव चिन्ह था - मुर्गा छाप। पडोसी होने की नाते और  घरेलु पहचान होने के नाते उन्होंने हमें चुनाव में कुछ सहायता करने कहा जो हमने स्वीकार कर लिया , (उन दिनों चुनाव में सिर्फ डेढ़ सौ खर्च हुआ उनका ! )
       घर के पीछे नदी किनारे घरो की एक लाइन थी जिसमे नदी किनारे बीडी बनाने वाले मजदूर रहा करते  थे। बीते साल (लगभग 1976 ) में बीड़ी पत्ते और तम्बाकू की कमी की वजह से बीडी कारखाने वालो ने उत्पादन में कमी करनी पड़ी , जिससे एक कारखाने को तो बंद करना पड़ा , जिससे मजदूर बेरोजगार हो गए, और भूखो मरने  लगे । उपास स्वरुप वे काकाजी (पार्षद ) के पास आये और अपनी स्थिति बतायी , साथ ही एक चालु कारखाने में काम दिला देने की बात कहने लगे।  काकाजी ने स्वीकार कर लिया। उन्होंने कारखाने के मालिक से बात की तो उन्होंने कहा कि आप कहते है तो रख लूंगा , पर इसके लिए मुझे हेड आफिस का उत्पादन घटा कर , मजदूरो की छटनी करना पडेगा ,काकेर स्थित शाखा में कच्चा माल भेजना पडेगा , और यदि बाद में ये नए भर्ती किये मजदूर, पुराना कारखाना वापस चालु हो गया तो  भी छोड़ कर न जाए, नहीं तो हमारा उत्पादन क्रम गड़बड़ा जाएगा , यही शर्त है। काकाजी ने श्रमिको से बात कर उनकी सहमति लेकर स्वीकार कर लिया।  कुछ दिन तो सब ठीक ठाक चला , बाद में पुराने कारखाने में कच्चा माल आ गया तो ये नए श्रमिक वापस भाग गए ! अब बीडी कारखाने के मालिक का उत्पादन क्रम गड़बड़ाने पर उन्होंने काकाजी से बात की -देखो महाराज , आखिर वही हुआ न जिसका डर था ! इसीलिये इस वर्ग का कोई भरोसा नहीं , दया भी करना बेकार है ! काकाजी अपना मुंह लेकर रह गए। 
                           अब नए चुनाव की बारी आ गयी थी , काकाजी को भरोसा था कि सभी लोग पहले की तरह साथ देंगे क्योकि पार्षद रहते हुए उन्होंने काफ़ी भलाई का काम किया था।  (उन दिनों भ्रस्ट्राचार नहीं था , नगरपालिका गरीब थी , पार्षद ईमानदार हुआ करते थे, पुरानी पीढी  के नेता आदर्श होते थे आजकल की तरह नहीं ). उनके विरुद्ध एक मुसलमान ठेकेदार और एक ब्राम्हण ईंट भट्ठे का मालिक खड़ा था। दोनों पहुंची हुई चीज थी।  उन्होंने करीब हर घर से एक लड़का रोजी पर चुनाव प्रचार पर रख लिया , इससे उस घर के वोट निश्चित हो गए पैसे की माया है। दूसरे मुसलमान ने अपनी जाति-गत वोटो पर भरोसा किया जो शाश्वत और सदा -सत्य होता है । और नदी किनारे बीडी मजदूरो को पचास पचास रुपये बाँट दिये। (हमारे कथित गरीबो की औकात सिर्फ पचास रूपए और एक पौवा दारु ही है आज भी ). बस इतने में खेल हो गया।  अब बीड़ी मजदूर भी काकाजी के घर के सामने से मुंह ढक कर रिक्शे में बैठकर (जो उस उम्मीदवार ने तय किया था ) जाते हुए दिखाई दिए। . खैर उस चुनाव में मात्र ८-१० वोटो से जीत तो गए , पर उन्होंने कहा कि जीत तो गया पर बिना भेदभाव के कार्य करूंगा और इसके बाद चुनाव कभी नहीं लडूंगा ये आखरी बार है , चुनावी खर्चा बढ़ जाएगा तो.…। १९७६ के बाद मैंने फिर कभी किसी पार्टी के लिए कोई कार्य नहीं किया। 
ग्रामीणो की भीड़ पर शहरी उच्च वर्ग ?
        इससे मुझे भी पता चला कि अच्छे लोग आगे क्यों नहीं आते ! देश सेवा के नाम से ! जनता ही इस लायक नहीं ! खासकर ये कथित गरीब वर्ग , जिसकी वजह से चुनाव खर्च बढ़ता है , जिसकी वजह से अच्छे लोग आगे आने से डरते है देश भक्ति, देश सेवा के नाम से , और जो लोग आते है लाखो खर्च कर , फिर पांच साल की गुना वसूलने में लग जाते है ! ज़रा सोंचिये कि क्या ये पिछड़ा वर्ग , ये कथित गरीब वर्ग , जो देश दुनिया से बेखबर रहता है , जिसे अंग्रेजो का राज्य हो या राजाओ का या फिर हिटलर का , कोई फर्क नहीं पडता , इनके हाथ में वोट देने का पॉवर होना चाहिए ? जिसकी औकात सिर्फ 'पचास रुपये और एक पाँव दारु ' होता है ! "आप+ मैं =हम" को कोई खरीद नहीं सकता ! इसलिए आज तक किसी प्रत्याशी ने कोई लोभ हमारे सामने नहीं रखा , और हम लोग अपने निर्णय से वोट देते आये। और वोट देने का निर्णय - पार्टी के अलावा अभी तक किये गए कार्य , देश हित आदि बातो को ध्यान में रखकर किया गया। मगर हमारा देश प्रेम उस समय गटर में चला जाता है जब एक मूर्ख व्यक्ति बिना सोंचे समझे , महज एक शराब की छोटी बोतल  और चंद  रुपयो के बदले वोट दे देता है , लोकतंत्र में गदहे घोड़े की एक ही कीमत होती है ! क्या बैलगाड़ी चलाने वाले को, जिसे कर चलाना नहीं आता , अपनी कीमती कार चलाने देना पसंद करेंगे ? फिर देश तो कार से भी ज्यादा कीमती है , मातृ भूमि ऐसे ही नहीं कहा जाता, जिसमे हम लोग पैदा हुए , पले  बढ़े ।
वोट देना अस्पताल जाने से भी ज्यादा जरुरी ?
अगर कोई शहरी होता इस हालत में ,तो जाने की जुर्रत नहीं करता !
पैसा ,दारु और मुर्गे की कीमत भी तो चुकानी है !

युवा वर्ग सोंचे गम्भीरता से परिवर्तन के  लिए ! इसका इलाज यह है - वोटरो की भी योग्यता होनी चाहिए तो भ्रस्ट्राचार खत्म हो जाएगा या बेहद कम हो जाएगा !
     

               

मंगलवार, 12 नवंबर 2013

" डौंडी वाले सर " : एक परिचय


आदरणीय " डौंडी वाले सर " : एक परिचय 


" डौंडी वाले सर " ये नाम मैंने   उन्हें श्रद्धावश दिया है।  वैसे नाम तो  श्री मंशाराम   शर्मा है।  सर को मै सन 1994 से जानता हूं। जब मुझ  दैवी आपदा आ गयी  थी मै  था।  तब दिमाग   भी काम  नहीं कर रहा था . मुसीबत में बुद्धि भी जवाब दे देती है . 
[इसका बड़ा लम्बा किस्सा है  "  ऑटो- बायो ग्राफी  "   भी मैंने लिख मारी है .] 
              एक शिक्षित व्यक्ति पर भरोसा थोड़ा जम ही जाता है।   मै घोर नास्तिक था , पूजा पाठ से कोसो दूर , अगरबत्ती जलाकर घुमाना भी ठीक से न आता होगा। लोगो पर हँसता था कि एक पत्थर पर सिंदूर लगाकर , उसे देवता  मानकर शुरू हो जाते है, पुजारी  लोग धंधा करने लगते है ,और लोग  भी अन्धों  की तरह उसके पीछे भागने लगते है ।
                सर अपने दिनों में शिक्षा विभाग में ए.डी.आई.  यानी अतिरिक्त शाला निरीक्षक के पद पर कार्यरत थे , उनके एक लडके पर  आक्रमण (अभिचार कर्म ) हुआ , इलाज चालु हुआ, साथ ही यह जानकारी मिलने पर कि तांत्रिक प्रयोग  हुआ है , काफ़ी दौड़ भाग भी किया , और जैसा कि अनेको के साथ होता है, सही व्यक्ति जो निवारण कर सके , नहीं मिल पाया , नकली , ढोंगी  या अधूरा ज्ञानधारी ही मिले। काफ़ी प्रयास करते करते थक गए , हारकर  स्वयं ही सीखना शुरू कर दिए चूँकि  खुद  भी ब्राम्हण वर्ग  से है । साधना इत्यादि से , अपने पुत्र की रक्षा तो कर गए पर पूर्णत: ठीक नहीं हो पाया ! परन्तु दैवी कृपा जो उन पर बरसी। यह  तो विधि का एक बहाना था , किसी और रास्ते ले जाने का।  अब सीखी हुई विद्या नौकरी में रहते रहते जन भलाई के काम लाने लगे , हजारो की सुरक्षा हुई ,हजारो के कष्ट निवारण हुए। इससे इन्हे प्रसिद्धि भी काफ़ी मिली। छत्तीसगढ़ के साथ साथ बाहर प्रदेशो तक  लोग जानने लगे।
1994 में मै भी भटकते हुए इनके पास पहुंचा। पहले से कुछ जानकारी मेरी समस्या के बारे में थी , जो भृगु ज्योतिष और  रवेली वाले महाराज के द्वारा हुई  थी ,वह इन्होने भी बता दी।  अब दूर करने की प्रक्रिया भी इनसे कराया। चूकि मुझे ज़रा भी इन बातो में विश्वास नहीं था  और साहब शिक्षित वर्ग से आते थे अतः मै शंकाग्रस्त होकर विविध प्रकार के प्रश्न पूछते रहता था।  सर ने एक भी बात का  बुरा न मानते हुए शंका निवारण किया , और कहा वास्तव में शिक्षित वर्ग इन सब बातो को नहीं मानता , न विश्वास  करता परन्तु इन सबका अस्तित्व सचमुच है। मेरी जिज्ञासा वे भली भांति समझते हुए शंका निवारण करते।  मैंने भी  चमत्कार, प्रमाण सहित  भी देखा , बारम्बार परिणाम भी मिले, कारण सहित ! अंतत: मेरा विश्वास बढ़ गया . उन दिनों मेरी आर्थिक स्थिति बेहद खराब थी 
(आज भी मै मध्यम वर्गीय हूँ , धन की देवी लक्ष्मी से शायद मेरी घोर शत्रुता है ). 
लेकिन उन परिस्थितियो में भी, उनकी बिना किसी लोभ के, जो सहायता की , उसके कारण भावनात्मक रूप में लगातार जुड़ाव महसूस करता हूँ।  चूँकि उन्होंने मुझे रास्ता दिखाया , संकट निवारण भी किया , विश्वास भी दिलाया , ये सब काम एक सद्गुरु के ही होते है शास्त्रानुसार , अत: मै  उन्हें गुरु ही मानता हूँ। परन्तु मेरा उनका सम्बन्ध बिना किसी आसक्ति  के सहज रूप से , सरल रूप से है। दैवी सिद्धिप्राप्त डौंडी वाले सर के आशीर्वाद से  मैंने स्वयं भी अनेक अनुभूतियाँ की। जो मेरे ही एक ब्लॉग  "IN SEARCH OF TRUTH "    renikjain@blogspot.com  में दिया गया है।  पाठक चाहे तो पढ़ सकते है। वर्त्तमान में ७५ वर्षीय गुरु देव का पता  मै केवल इसलिए दे रहा हूँ, ताकि मेरे जैसे मरणतुल्य   परेशानी उन्हें न उठाना पड़े और  पाठक गण , यदि किसी दैवी आपदा से पीड़ित हो तो संपर्क कर सके।
- पता :- पंडित मंशाराम जी शर्मा ,(मोबाइल -094241-23762 ,099074 -64636 )
 बस स्टैंड के पीछे ,
 ग्राम डौंडी , जिला दुर्ग (छत्तीसगढ़)
(सर का ग्राम डौंडी , भानुप्रतापपुर से दल्लीराजहरा मार्ग पर दल्लीराजहरा से १२ किलो मीटर की दुरी पर हैं।)
टीप:- दुखद सूचना मिली कि दिनांक 27/6/2018 को दोपहर करीब 1 बजे डौंडी वाले सर का स्वर्गवास हो गया, उस समय भी वे लोगो की समस्याएं ही सुन रहे थे, बिना किसी कष्ट के सुनते 2 ही सो गए और देह त्याग कर दिया।

रविवार, 10 नवंबर 2013

मिडिल क्लास होने का दुख : Sadness of being Middle Class (Hindi)


मिडिल क्लास होने का दुख 
                                        देवियो और देवताओ (बराबरी का ज़माना है इसलिए सम्मान भी बराबर का ) , बहुत दिनों से एक दुःख मन को खाये जा रहा था , सोंचा आज बक ही दूँ , भड़ास निकल जायेगी और दिमाग भी हलका हो जाएगा।  मै  एक मिडिल क्लास का हूँ , इसलिए चुनाव के टाइम कोई वोट मागने और लालच देने नहीं आता।  ये साले मिडिल क्लास वाले बिकाऊ नहीं होते , जो सोंच रखे होते है उसी को वोट देंगे। काश हम भी आरक्षित वर्ग के होते, झोपड़पट्टी वालो की तरह इज्जत होती , चुनाव के समय हमारी इज्जत बढ़ जाती, कोई दारु लेकर, पैसा लेकर आता, हमारी पूछ परख करने, तो कोई कम्बल , साड़िया लेकर आता , हमें गिफ्ट देने।  पर साला हम तो न घर का न घाट का।  विशुद्ध मिडिल क्लास का, बिकाऊ माल नहीं । कौड़ियो की भी इज्जत नहीं ! उन जैसा अल्पसंख्यक होते , हमारा भी धर्म गुरु होता जो वोट देने की अपील करता किसी ख़ास पार्टी को। हमें भी दावते ख़ास मिला करती , लोग सालो साल पूछ परख करते। हमें भी तीर्थ यात्रा में रियायते मिलती, पर नहीं, हमारे वैसे भाग्य कहाँ  ?
                             चुनाव आ  गया , कोई तो मरदूद आये हमसे पूछने , वोट मांगने , फिर कहे वोट के बदले क्या चाहिए - तो हम प्रेम से कहते एल.ई.डी.  टीवी पहुंचा दो हमारे यहाँ , वह भी २८ इंची ! (अब हम अपने स्टेंडर्ड के हिसाब से ही तो मांगेंगे !). वो चुनावी घोड़ा, जो सरपट भागता कि दुबारा वोट मांगने नहीं आता , एक लाख  खर्च एक वोट के लिए ? अब  हम इतने सस्ते भी तो नहीं जो आधा पाँव दारु और पचास रुपयो में ही वोट देने की जुर्रत कर बैठे ! अब तो हाई क्लास जमाने में मोबाईल , टेबलेट और लैपटाप भी बंट रहे  है, तो हमें भी लेने से गुरेज क्यों? हम भी लैपटाप , एल ई डी टीवी  का शौक फरमा सकते है . देश की चिंता किसे है ? पहले खुद , परिवार, फिर पार्टी , फिर पार्टी का टिकट ,देश का नंबर तो आखरी में आता है न? उसके लिए सांसद तो है, वही करे  चिंता, मै अकेले क्यों दुबला होऊ .  और भी लोग तो है उच्च वर्ग के , निम्न वर्ग के तो जनता जनार्दन ! मै तो सिर्फ गर्दन हूँ , जनार्दन नहीं। महगाई बहुत बढ़ गयी है , हमें तो सस्ता चावल भी नसीब नहीं , उच्च वर्ग तो बासमती खा लेता है चाहे किसी भी कीमत पर मिले , कोई फरक नहीं पडता , पर हम धोबी के गधो को मंहगा चावल ही खरीदना पड़ता है।
          सरकार आजकल निम्न वर्ग को एक-दो रुपये किलो चावल बाँट रही है , जगह जगह दारु की दूकान खुलवा रही है ताकि "" वोट बैंक"   भाइयो को पीने दूर जाने का कष्ट न करना पड़े ,  उच्च वर्ग भी तो मलाई खींच रहा है , हमने कौन सी ब्रम्हा जी की भैंस खोल ली थी ,जो हम  मिडिल क्लास वालो को यह दिन देखने पड़  रहे है ? मंझला होने के नाते कुत्ता भी नहीं पूछता !

शनिवार, 9 नवंबर 2013

पीलिया एक घंटे में ठीक होने लगा : Jaundice cured in just one hour (Hindi)

पीलिया एक घंटे में ठीक होने लगा :-
आफिस काम से एक बार मै प्राविडेंट फंड आफिस गया था , गर्मी के दिन थे , वहां वाटर कूलर से एक गिलास पानी पी लिया , सरकारी निम्न क्लास के लोग जिनका "कामचोरी" ही धर्म है के कारण मोहदापारा (रायपुर) में दूषित जल सप्लाई हो रहा था , और शायद वाटर कूलर भी अनेक दिनों से साफ़ नहीं हुआ था , जल दूषित था और मात्र एक गिलास से ही  मै  पीलिया रोग का शिकार बन गया । अब आफिस से  कई  दिनों की छुट्टी लेना पड़ा , और डाक्टरो की दवाइया चल पड़ी , अनेक आयुर्वेदिक , एलोपैथिक दवाइयां  दी गयी पर असर शुन्य , किसी ने बताया गान्ना  रस से पीलिया पर अच्छा असर पडता है तो किसी ने झाड़फूंक , गले में बांधने की टोटका वाली चीजे , कई  दिनों से ठीक न हो पाने के कारण दवाइयो के साथ यह भी करता चला  , पर बेकार  साबित हुए।  थक हार कर मैंने अपने मित्र डाक्टर ईश्वर रमानी को फोन लगाया , उन्हें अपनी स्थिति बताई दवाइयो के नाम भी, कम्पनियो सहित। उन्होंने फ़ोन पर ही कहा - कहां लगा रखा है यार ! अच्छा बता तेरे पेट में कुछ तकलीफ है क्या ? मैंने कहा हां , फिर उन्होंने एक होमियोपैथी की एक दवा बता कर कहा -इसे होमियोपैथी की दूकान से लेकर एक डोज अभी , एक डोज रात्रि को , एक डोज सबेरे ले लेना।  मैंने मंगवाकर एक डोज लिया, आधे घंटे बाद ही बेहद गहरे रंग का पीला पेशाब हुआ , और आँखों ,चेहरे का पीला रंग कम हो गया , काफ़ी राहत मिली।  मै चकित रह गया असर देखकर। रात्रि एक बार फिर पेशाब हुई पर उसमे पीलापन काफ़ी कम था। दूसरे दिन सबेरे तीसरा डोज लिया।  अब मैंने डा साहब को फोन लगाया , तो उन्होंने आफिस जाने की अनुमति दे दी पर मैंने सोंचा अभी कमजोरी है आज  और आराम कर लेता हूँ ।  खाने पीने के बारे में कोई परहेज  करने की जरूरत नहीं अब - ऐसा डाक्टर साहब ने कहा ।  चावल खा, आलू खा, मिर्ची खा, जो तेरे मन में आये वह खा- यही कहा था उन्होंने। पर दवाई का चौथा  डोज मत लेना चाहे हल्का पीलापन भी क्यों न रहे। तीसरे दिन मैंने आफिस जाना शुरू कर दिया।  मेरा  बताने का मकसद यह है कि होमियोपैथी से पीलिया जैसा रोग एक घंटे में जादू की तरह ठीक हो जाता है, बस दवा सही होना चाहिए । सबसे तेज दवाई है ये।  जबकि दो लोग जो मेरे परिचित भी थे और एक तो रिश्तेदारी में भी था , पीलिया रोग से उनकी मौत हो गयी , इतना खतरनाक होता है ये। 
 (डॉ ईश्वर रमानी वह डाक्टर है जो एम बी बी एस होने के बाद बारह साल एलोपैथी की प्रेक्टिस करने के बाद एलोपैथी बंद कर होमियोपैथी से मरीजो का इलाज करने लगे , चुनौतीपूर्ण केसेस में ही उनको आनंद आता है , इनका लगातार संपर्क ने ही मुझे होमियोपैथी का नशा चढ़ा दिया , बातो बातो में ही बहुत ज्ञान मुझे मिला जो पुस्तको में भी नहीं मिलता ! पहले कांकेर निवासी ,अब भिलाई निवासी है, जन हित में दिया गया मेरे द्वारा )
बहूत मुश्किल होता है किसी जानकारी को सार्वजनिक करना, लोग misuse करने लगते है,इसलिए फोन नम्बर हटाया गया,वस्तुतः ये बताने का उद्देश्य ये समझाना था कि 
1-पीलिया का भरोसेमंद इलाज होमियोपैथी में है।
2-इलाज के लिए होमिओडाक्टर पास जाना पड़ता है ताकि लक्षण आदि देखकर दवा का चुनाव हो सके।
पर लोगो ने तो घरबैठे ही बिना किसी खर्च के डाक्टरी सलाह मागना शुरू कर दिया, जैसे कोई डाक्टर 24 घण्टे मुफ्तखोरो के लिए ही जन्म लिया हो।

बुधवार, 6 नवंबर 2013

माइग्रेन से लड़ाई : Fight with Migraine (Hindi)


माइग्रेन से लड़ाई :-
   
माइग्रेन जिसे हिंदी में अटकापारी  या आधे सिर का सिरदर्द या आधा शीशी सर दर्द , आयुर्वेद में अर्ध विभेदक    कहते है, ने मुझे काफ़ी परेशान किया था , करीब दस साल तक। उस समय मेरी आयु लगभग १५ वर्ष रही होगी , नवमी पढ़ता था।  सर के सिर्फ दाहिने और तेज  दर्द का दौरा पड़ता था , मानो सर फटा जा रहा हो . सरकारी अस्पताल में जाता तो तनखाजीवी डाक्टर सिर्फ देखते ही नाम पूछ कर सर दर्द  की कोई दवाई लिख देता था जो बेकार साबित होती। कई  वर्ष यूं ही बीत  गए . . एक बार एक नामी गरामी डॉ कछवाहा ने पकड़ा कि मुझे माइग्रेन है। फिर उनकी दवा एलोपैथी से मुझे पहली  बार आराम मिला . पर स्थायी इलाज नहीं था ये।  कुछ अंतराल के बाद फिर सर दर्द होता तो वही दवा दुहरानी पड़ती। १९ वर्ष की आयु के बाद फिर रायपुर में डाक्टर भागवत ने पकड़ा कि मुझे माइग्रेन है जिसका स्थायी रूप से कोई इलाज नहीं । बस दवा लो , फिर कभी हो तो फिर दवा लो।ऐसा करते करते एकाध साल फिर बीत  गया। फिर दर्द होने शुरू हुआ तो मेडिकल कालेज के अस्पताल में भागा , चूँकि अनेक दोस्त मेडिकल कोर्स कर रहे थे  अत: आसानी थी प्रोफ़ेसर लोगो को दिखाने में।  वहा भी माइग्रेन 'डाइग्नोस' हुआ  , पर बताया गया कोई स्थायी इलाज नहीं , लाइलाज है यह बिमारी।
अब मैंने एक बात ठान ली -दुनिया में जितने प्रकार के रोग भगवान ने बनाये है  उसका इलाज भी कही न कही बनाया है , बस सही जगह, सही व्यक्ति, और सही समय, सही दवाई तक पहुँचना मरीज के भाग्य पर निर्भर करता है।  मै लगा रहा। आयुर्वेदिक आदि भी आजमाया पर फेल , टोना टोटका आदि भी आजमा कर  देखा , पर वो भी बेकार। एक पत्रिका में पढ़ा कि मनोविज्ञान में इसका इलाज है सो भागते भागते रविशंकर यूनिवर्सिटी के मनोविज्ञान विभाग के डीन के पास जा पहुचा, बोला  - मेरे माइग्रेन का इलाज शायद मनोविज्ञान में है ऐसा मैंने एक पत्रिका में पढ़ा है , मेरा इलाज करवा दीजिये।  इस पर डीन साहब बोले बाफना जी यदि आपके माइग्रेन का इलाज हो जाए तो मुझे बताना मै भी माइग्रेन से पीड़ित हूँ। फिर मनोचिकित्सक  के पास जा पहुंचा , सायकोथेरेपी से कुछ लाभ पहुंचा।  पर वर्षो बाद दाहिनी कनपटी पर एक नस में दर्द फिर होने लगा।  एक होमियोपैथी के डाक्टर के पास जा पहुंचा , जिसने सी .एम. पोटेंसी की दवा दी तो 'एग्रावेशन' होकर काफ़ी तेज दर्द होने लगा।  अब डाक्टर रमानी के पास जा पहुंचा , उन्होंने मेरी होमियोपैथी दवाई खोज ली और उसी से ठीक हो गया  उन्होंने मुझे मेरी दवाई बता भी दी ताकि मेरी जानकारी में रहे।  यही दवाई मलेरिया  के भी काम आती है इससे मलेरिया से भी रक्षा हुई।  आज मेरी उम्र ५५ साल हो गयी है और मै लगभग 27  साल से माइग्रेन से पूरी तरह मुक्त हू , मुझे बीस साल में कभी भी माइग्रेन का अटैक  नहीं हुआ।  साथ ही साथ मलेरिया भी नहीं हुआ। यह अनुभव  सिर्फ इसलिए लिख रहा हू ताकि माइग्रेन के रोगियो को सन्देश मिले कि इसका इलाज होमियोपैथी से सम्भव है , अत: वे किसी भी होमियोपैथ के पास जाए और छुटकारा पाये मेरी तरह , इस दर्द को मैंने बहुत भुगता , इस तडफ़न को मै जानता हूं। वैसे रायपुर , भिलाई,आदि आसपास के छत्तीसगढ़ के लोगो के लिए डॉ ईश्वर रमानी का फोन नंबर दे रहा हू ताकि इस आत्महत्या कराने वाले सर दर्द से हमेशा के लिए छुटकारा पा सके -
डॉ. ईश्वर रमानी -भिलाई/रायपुर /कांकेर /बिलासपुर  -98271 -17452
(वैसे तत्काल राहत पाने के लिए - एक बंगला पान की पत्ती ले , उस पर पिपरमेंट का सत (ठंडई ) के कुछ टुकड़े रखा कर नीचे एक माचिस की तीली जलाकर आंच दिखाए , इससे सत पिघल जाएगा , इस पिघले सत को माथे पर लगाले , तुरंत माइग्रेन , एवं सर्दी सूखने से हुआ दर्द ठीक हो जाता है , मेरा अनुभूत है , पान का पत्ता बंगला पान का ही  ले , कपूरी पान या कटोरी में पिघलाने से असर नहीं करता )
                                                                                                                                                                  

मंगलवार, 5 नवंबर 2013

भागवत कथा में शामिल करने योग्य बाते : Hindu Dharm (Hindi)

भागवत कथा में शामिल करने योग्य बाते :-
अगर कथा वाचक कथा करते समय कुछ निम्न बातो की शिक्षा भी देना शामिल कर लेवे तो कम पढ़ी लिखी भारतीय जनता का सामाजिक मार्गदर्शन हो जाएगा और देश का उद्धार हो जाएगा पर  दुर्भाग्य से ऐसा हो नहीं रहा।
1 - हिन्दू धर्म यानी धर्म हजारो वर्ष पुराना है , जैन व बौद्ध धर्म 2500 वर्ष पुराने है , सिक्ख धर्म 400 -500 वर्ष पुराना है , इस्लाम 1400 वर्ष तथा ईसाई २००० वर्ष पुराने है , जब ये नए धर्म नहीं थे तब क्या था ? कृष्ण काल व् रामायणकाल में कौन सा धर्म था ? उस समय सिर्फ धर्म और अधर्म था और ये धर्म सनातन धर्म ही था।  ये बात सही है कि काल के प्रभाव से इसकी मान्यताओ में विकृति आयी परन्तु ये मानने वालो का दोष था।  धर्म तो आज भी पवित्र है , माननेवाले व्याख्या अलग -अलग करते है।
२- हिन्दू धर्म में गाय को माता कहा गया है , परन्तु अपने आप को हिन्दू कहने वाले शहरो में जहा चरागाह नहीं वहा गाय पालते है और उनको लावारिस छोड़ देते है , बेचारी भूखी प्यासी गाय माता प्लास्टिक की थैलिया  आदि जहरीले पदार्थ खाती है और सडको पर रात भर बैठती है।  फिर उन गायोकी मौत  बीमारियो से या सड़क पर ट्रको के नीचे दबकर  हो जाती है।  गाय माता की हत्या का दोष किस पर आयेगा ? ट्रक वालो पर , प्लास्टिक कचरा फेंकने वालो पर ? सबसे बड़ा दोष शहरो में गाय पालने वालो को आयेगा क्योकि बिना चरागाह के , उन्हें दाना पानी दिए भूखो मरने छोड़ने वाले हिन्दू ही गाय माता के हत्यारे कहलायेंगे।
३- अपने को भगवान के भक्त कहने वालो की कमी नहीं इस दश में , परन्तु कर्म उलटा।  वर्षो से भगवानो के चित्र वाले अगरबत्ती , मसाला , अनाज आदि घरेलु चीजे खरीदते आ रहे है फिर पैकेट खाली कर उन चित्रो को नालियो , टट्टी पेशाब की गन्दी जगहो पर  फेंक देते है , सोंचो एक तरफ आप अपने को भगवान राम, कृष्ण , हनुमान के भक्त मानते हो , दूसरी तरफ उनके फोटुओ को नालियो में फेंकते आ रहे हो ? यही है आपकी भक्ति ? क्यों नहीं आप उन वस्तुओ को जिनकी पैकिंग पर ये चित्र छपे हो , खरीदना बंद कर देवे , दूसरो को भी मना करे , साथ ही धंधे वालो को भी ऐसी वस्तुए बेचने से मना करे और निर्माताओ को भी विरोध पात्र लिखे और प्रचार करे ।
4 -बौद्ध और जैन धर्म सनातन धर्म की शाखा है परन्तु धर्म व् समाज के कुछ दुकानदार इन धर्मो को हिन्दू से अलग कहते है।  अलग कैसे है ? क्या भगवान बुद्ध ने दुर्गा देवी के एक रूप तारा देवी की भक्ति नहीं की थी , जहा स्वयं बुद्ध देवी उपासक थे वे अब हिन्दू धर्म से अलग कैसे हो गए ? और जैन धर्म वाले जो हर मंदिर में भैरव जी जो शंकर जी के गण है, की उपासना करते है, इसी तरह अम्बिका देवी यानी दुर्गा , पार्श्व यक्ष यानी गणेश भगवान ,पद्मावती देवी  यानी लक्ष्मी माता की उपासना करता है, वह हिन्दू धर्म से अलग कैसे हो सकता है? सिक्ख धर्म में गुरु अर्जुनदेव की कथा में भगवान विष्णु लक्ष्मी देवी सहित स्वर्ण मंदिर के निर्माण के  होने की कथा है ,और गुरु गोविन्द ने तो मुगलो का सामना करते समय विजय के लिए देवी दुर्गा की उपासना की थी। अगर सिख धर्म की ये कथाये झूठी नहीं तो सिक्ख धर्म और हिन्दू अलग अलग  कैसे हुए ? ये सब ऐसे ही है जैसे हनुमान भक्त राम विरोधी कैसे हो सकता है ? या राम भक्त शिव विरोधी कैसे हो सकता है ? इन सभी धर्मो के अनुयायी विवाह के बाद मांग में सिंदूर भरते है , हाथो में चूड़िया पहनते है, अग्नि के फेरे लेते है , भगवान की पूजा में फूल धुप अगरबत्ती का प्रयोग करते है , फिर हिन्दू से कैसे अलग हुए ? राजनीति व् स्वार्थ ने इन्हे अंधा कर दिया है।
5 - आजकल ईसा मसीह के अनुयायी हिन्दुओ को बरगलाने  में व धर्म परिवर्तन कराने में लगे हुए है। विदेशी इशारो पर भोले भाले हिन्दू ग्रामीणो को धन का लालच देकर तथा उलटे सीधे तर्क देकर भड़काते है। सच तो यह है हिन्दू धर्म यातना महान है कि किसी भी देवी देवता का अपमान न करने की शिक्षा देता है चाहे आप उसे मानते हो या नहीं। हिन्दुओ के लिए तो हर महात्मा पूजनीय है परन्तु अन्य धर्मवाले अपने धर्म को मानने व् दूसरे धर्म के प्रति घृणा करने की शिक्षा ही देता है। किसी ईसाई फादर या नन को मंदिर में पूजा करते देखा है? किसी मुसलमान को किसी मंदिर या चर्च के सामने सर झुकाते या मंदिरो का प्रसाद खाते देखा है ? शायद कभी नहीं ! और देखोगे भी नहीं ! दोष ईसा मसीह में नहीं उसके माने सालो में है , ईसा तो महात्मा था , धर्म देश हिंदुस्तान से शिक्षा दीक्षा लेकर अपने देश गया धर्म की शिक्षा देने क्योकि वहा चारो और अधर्म और पाप फैला हुआ था . उसके इस कार्य से क्रोधित हो लोगो ने सूली पर ही चढ़ा दिया -क्रूरता पूर्वक मार डाला ! बाद में क्रूरता की निशानी सूली यानी क्रास को ही पवित्र चिन्ह बना डाला। ज़रा सोंचिये -  मोहम्मद को तथा गुरु गोविन्द सिंह को दुष्टो ने तलवार से मारा डाला तो क्या तलवार पवित्र चिन्ह या धार्मिक चिन्ह बनना चाहिए? कल को किसी पॉप या फादर को किसी अलकायदा के हिंसक सदस्य ने जूतो से पिटाई की तो क्या जूता पवित्र चिन्ह माना जाएगा ? शायद ईसाई मानेंगे !

टुकड़ो टुकड़ो में बंटता जैन धर्म : Jain Religion cut into Pieces (Hindi)


SHRI JITENDRA JAIN(Doshi)
RENIK BAFNA

टुकड़ो टुकड़ो में बंटता जैन धर्म 
लेखक -रेणीक  बाफना , रायपुर (छ.ग. )
                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                           

यूँ  तो जैन धर्म भारत की जनसंख्या का सिर्फ ०. प्रतिशत से १. प्रतिशत ही बताया जाता है। ये प्रतिशत तो तब है जब साड़ी शाखाओ उपशाखाओ को एक माना जाए, अन्यथा दिगंबर ,श्वेताम्बर , स्थानकवासी के अलावा खरतरगच्छ , तपॊगच्छ आदि अनेक टुकड़े है जिनका प्रतिशत निकाला जाए तो.… ……… …… ? चलिए ज़रा इतिहास में ताक झाँक करे आखिर ये टुकड़े क्यों और कैसे हुए !

प्रथम विभाजन :- भगवान महावीर स्वामी के बाद क्रमश: गौतम , गांधार , सुधर्म स्वामी , जम्बू स्वामी का ६२ वर्ष का कार्यकाल ६२ वर्ष का रहा ते तीन केवली कहलाते थे।  तो विष्णुकुमार , नदी मित्र , अपराजित , गोवर्धन एवं भद्रबाहु आदि पांच श्रुतकेवली हुए जिनका कार्यकाल लगभग १०० वर्षो का हुआ।  इस प्रकार महावीर स्वामी के १७० वर्ष बाद आचार्य भद्रबाहु का स्वर्गवास हुआ . परन्तु इनके कार्यकाल में जैन पंथ के विभाजन का बीजारोपण हो चुका था म इसलिए भद्रबाहु को दिगंबर और श्वेताम्बर दोनों सम्प्रदाय मानते है। 



                                    मतभेद का कारण सम्भवत: यह था  कि कुछ साधुओ के मन में यह विचार आया चूँकि उन्हें आहार के लिए ग्राम व् नगर सांसारिक लोगो के बीच जाना पडता है , अत: उन्की मर्यादा , लज्जा का ख्याल रखा जाना चाहिए।  साधना तपस्या मन की होती है तन की नहीं।  अत: उनके बीच जाते समय श्वेत वस्त्र से शारीर को ढकने में कोई बुराई नहीं , जानकी कुछ परम्परा में कोई परिवर्तन करने के सख्त विरुद्ध थे।  इससे साधू समाज दो भागों दिगंबर और श्वेताम्बर में विभाजित हो गया।

द्वितीय विभाजन :-
जैसा कि हर धर्म में हुआ , लोभ या दिखावा करने की प्रवृत्ति मानवीय स्व्भाव में है , मूर्तिपूजन की पद्धत्ति (जो कि दिगंबर श्वेताम्बर दोनों में थी )में की कर्मकांड , विधि,,परम्पराए आदि जुड़ती चली गयी , यहाँ तक कि सर्वस्त्र त्यागी तीर्थंकरो को भी उन्ही कर्मकांडो में लिप्त कर दिया।  साधुओ के मन में विचार कि ईश्वर तो अनत: निराकार है।  साधना में मूर्ति आदि तो भौतिक वस्तुओं का प्रयोग तो स्वयं तीर्थंकरो ने भी नहीं किया , अत: व्यर्थ के कर्मकांडो को जो बाद में जोड़े गए उनका त्याग करना ही उचित होगा और निराकार उपासना पद्धति को अपनाने से ये किनारे हो जायेंगे। वस्तुत: जैन पंथ की पद्धति तत्कालीन हिन्दू धर्म का सुधारवादी पद्धति ही थी क्योकि हिन्दू धर्म में एक वर्ग द्वारा अपने स्वार्थ पूर्ति के लिए अनेक कर्मकांडो व् ढकोसलों को जोड़ा गया था। जिससे लोग त्रस्त  थे। इसके विपरीत कुछ साधू लोग साकार उपासना से जुड़े रहना चाहते थे ताकि ध्यान , कल्पना का एक माध्यम बना तो रहे। लोगों  का जुड़ाव भी धर्म से बना रहे।  दोनों तर्क अपनी जगह वजनदार थे , परन्तु विभाजन की नीव पद ही गयी - साकार और निराकार उपासना पद्धति के आधार पर क्रमश: मंदिरमार्गी और स्थानकवासी। (इसी प्रकार मुस्लिम एवं सिक्ख धर्म निराकार उपासना एवं ईसाई धर्म साकार उपासना पर आधारित है , सनातन  धर्म जो मातृ धर्म कहलायेगा , में दोनों पद्धतियाँ सामान रूप से प्रचलित है, परिस्थितिया और परम्परा के अनुसार )

तृतीय विभाजन :-
स्थानकवासी में कड़े नियम बना रखे थे जो उस काल की आवश्यकतानुसार थे , परन्तु देश काल में परिवर्तन होते रहता है अत: अनेक साधुओ के मन में पुन: विचार आया, जिन नियमो की प्राचिकाल में जरूरत थी , बदली हुई परिस्थितियो में उसकी आवश्यकता नहीं। जैसे पहले साबुन पशुओ की चर्बी से बनाई जाती थी , बाद में केवल वनस्पति तेलो से ही बनाने लगे इत्यादि अत: साबुन से नहाना धर्म विरुद्ध घोषित करने की जरूरत नहीं रह गयी।  इसके विपरीत अनेक साधू परम्पराओ या प्रतिबंधो में किसी भी परिवर्तन के विरुद्ध थे , फलत: पुन: विभाजन की नीव पड़ी - स्थानकवासी एवं दिगंबर से अलग हुआ तेरापंथी और तारापंथी
   
   अब जैनियों के चार दुकड़े हो चुके थे - दिगंबर , श्वेताम्बर , स्थानकवासी और तेरापंथी।  परन्तु सिलसिला चलता रहा और गच्छ के आधार पर -उपकेश गच्छ ,तपागच्छ ,कोरंटगच्छ , रुद्रपंथी गच्छ , शंखेश्वर गच्छ ,जैसे अनेक टुकड़े टुकड़े कर दिए।  यही हाल तेरापंथ और स्थानकवासी में भी हुए गुटीय आधार पर।
                                                                              

गांधी जी जब " इंडिया " आये : When Gandhi Ji came to "INDIA"


गांधी जी जब  " इंडिया " आये
--आर के बाफना , रायपुर (हस्तरेखा विशेषज्ञ ) (98279 -43154 )

स्वर्ग में गांधी जी बहुत बोर हो रहे थे। करने को कोई काम धाम तो था नहीं। केवल प्रभु भक्ति करते और कभी इंद्र सभा का आनद उठाते। उसमे भी मन नहीं लगता।  रह रह कर उन्हें पुराने दिन याद आते -- जब डरबन  दक्षिण अफ्रीक़ा में अंग्रेजो ने उन्हें ट्रेन से नीचे फेंका था - तो गुस्से में आकर उन्होंने अंग्रेजो को हिंदुस्तान से भगाकर ही दम लिया था। बेचैनी की हालत में उन्होंने प्रभु से प्रार्थना की ------- हे प्रभु स्वर्ग में मई बहुत बोर हो रहा हूं।  मुझे अपना हिंदुस्तान देखने की बड़ी इच्छा हो रही है कृपया मुझे मृत्युलोक भ्रमण करने की अनुमति दे। प्रभु श्री राम (नारायण) ने समझाते हुए कहा -- हे मोहनदास तुम आज का हिंदुस्तान देखने की जिद ना करो , तुम्हे बहुत दुःख होगा , परन्तु गांधी जी भी जिद में अड़े रहे। भक्त के आगे भगवान भी झुकते है , अत: भगवान को झुकना पडा। उन्होने  इस शर्त पर अनुमति दे दी की तुम अकेले ही अदृश्य रूप  में जाओगे , तुम्हारे साथ तुम्हारी रक्षा के लिए कोई "यम कामाण्डो" नही होगा चिंता की कोई बात नही , तुम्हे न तो कोई देख पायेगा , न ही कोई नुकसान पहुंचा पायेगा। तुम सब की सुन सकोगे तुम्हारी बात कोई नही सुन सकेगा। गांधी जी तैयार हो गये. और प्रभू इच्छा से सीधे हिन्दुस्तान में "लैण्ड " कर गये.


 कितना बदल गया हिन्दुस्तान , चारो और कांक्रीट की बडी बडी इमारते , आधुनिक बाग़ बगीचे ,बडी बडी फैक्ट्रिया ,अनगिनत कारे और दो पहिया. बडी प्रसन्नता के साथ गान्धी जी इधर उधर घूमने लगे. चलते चलते एक राजनीतिक पार्टी के कार्यालय में जा पहुंचे।  वहा गान्धी जी (उन्ही की) एक बडी सी तस्वीर लगी थी , गान्धी जी बडे प्रसन्न हुए, इतने बाद वर्षो बाद भी नेता और जनता उन्हें याद कर सम्मान देते है. वहा गांधीवाद के सिद्धांतो पर भाषण चल रहा था।  समोसे और जलेबियो की प्लेटो पर हाथ चलाते, झक झक से सफ़ेद कपडे  पहने नेता लोग अगले चुनाव की रणनीति भी  बनाते  जा रहे थे कि  गान्धी के नाम पर लोगो को और कैसे मूर्ख बनाया जाए , पर ये खानदानी गांधी वे स्वयं नही, कोई और था या थी  ! बातो बातो में पता चला -किसी वेदेशी महिला को वे गान्धी कहते थे. यह देख उन्हें दुःख हुआ।  थोड़ी देर में पता चल गया की उनके करकमलो से बनायी गयी एक पार्टी एक विदेशी महिला के इशारों पर नाच रही है. सभी खद्दरधारी नेता स्वार्थ सिद्धी एवं चमचागिरी में लीन है. यानी परदे के पीछे फिर विदेशी हुकूमत ! थोड़ी देर बाद सभा समाप्त हुई , कुछ को छोड़कर सभी चले गये. फिर गान्धी जी की तस्वीर के नीचे पास पास इकट्ठा हो बचे लोग अंग्रेजी शराब की बोतल खोल जाम छलकाने लगे , यह देख गान्धी जी को बडे दुखी हुए -जिन चीजो का उन्होंने विरोध किया था उसका सब उल्टा पुलटा हो रहा था , वह भी उनके नाम पर ! बडे दुखी मन से गान्धी जी वहा से मार्केट जा पहुंचे। एक किरांना  दूकान में "दांडी" नाम से नमक का पैकेट बिक रहा था। उत्सुकता से वहा रुक कर देखा तो वह आयोडिन नमक के रूप में टेक्स सहित बड़े मंहगे दामो में बिक रहा था। दांडी से उन्हें याद आया की एक दांडी मार्च उन्होंने अंगरेजो के खिलाफ किया था नमक पर टेक्स लगाने के खिलाफ ,क्योकि यह गरीबो के खिलाफ था।  अब इसी दांडी के नाम से यही नमक, नमक के ही ब्रांडो के बीच टेक्स सहित मंहगे दामो में बेचा जा रहा था ! (वैसे आयोडीन अस्थायी होता  है, रसायन शास्त्र के विद्यार्थी जानते है ) गांधी जी और दुखी हो आगे जाकर एक न्यायालय में घुस गए।  जज के पीछे गांधी की बड़ी सी तस्वीर लगी थी ,  इससे  उन्हें कुछ सुकून मिला , पर क्षणिक।  खतरनाक अपराधियों को सबूत ,गवाही और राजनितिक शरण के  चलते "बाईज्जत " बरी होते देखा और गरीबो को न्यायालय में पिसते देखा , वकीलो द्वारा लूटते देखा।  यह देख गान्धी जी को अंगरेजो का न्याय याद आने लगा।वहा से दुखी हो गाँधी जी एक पुलिस थाने  जा पहुंचे , वहा थाने के मुंशी के पीछे गान्धी जी की एक तस्वीर लगी हुई थी जिसमे आशीर्वाद की मुद्रा थी। एक निरीह व्यक्ति थाने में रिपोट लिखवाने आया था , और थाने  का मुंशी उससे पांच सौ रुपये मांग रहा था , पर गरीब के पास पांच सौ रुपये नही थे -वह दो सौ रुपये देने की बात कर रहा था।  तिस पर मुन्शी डाँटते हुए कहा- देख गान्धी जी की तस्वीर को, वे भी कह रहे है पांच सौ, हमारी नही तो गान्धी जी इज्जत का तो ख्याल कर ! गान्धी जी ने चौंक कर  अप्नी ही तस्वीर को देखा जिसमे वे आशीर्वाद की मुद्रा में हाथ का पंजा फैलाए हुए थे, जिसे मुन्शी पांच का आकड़ा बता रहा था। यह देख गान्धी जी का मन, मानो टुकड़े टुकड़े  हो गया। बडे भारी मन से वे आगे बढ़ पास के पोस्ट आफिस में घुस गए , वहा सभी लिफाफों में गान्धी टिकट लगी हुई थी , उनका चेहरा घर घर में पहुँच रहा था , पर यह क्या ? पोस्टमैन इन सब टिकटो पर काले रंग की स्याही के एक मुहर द्वारा कालिख पोत  रहा था। अब गान्धी जी की सहन शक्ति जवाब दे गयी  और वे वापस स्वर्ग प्रभू के पास उडकर पहुँच गए , उडते हुते एक नजर सारे हिन्दुस्तान पर डाली, दिव्य दृष्टी  से चारो और देखा तो  सरकारी और राजनीतिक कार्यालयों में अराजकता , घूसखोरी , भ्रस्ट्राचार , मिलावट , लूटमार आदि दिखाई दिया। स्वर्ग  पहुँच कर वे प्रभु से बोले - हे प्रभु , आपने ठीक कहा था , अब मै  कभी हिन्दुस्तान जाने की जिद नही करूंगा।  प्रभू सारी बाते समझ गये , मुस्कुराते हुए बोले - तथास्तु


मुखौटा : Mukhouta (Hindi)

मुखौटा
सामाजिक सम्मेलन चल रहा था , सभी अपने चहरो पर मुखौटा (शायद समाज सेवा का ) लगाए हुए एक दूसरे को टोपी पहनाने का मौका ढूंढते हुए , दूसरो के कंधो के सहारे बन्दुक चलाने का मौका ढूढते हुए , आनद लूट रहे तेह।  सभी आपस में एक दूसरे को तिलक लगाते हुए , माला पहनाते हुए अभिनन्दन कर रहे थे , इसके बाद भोजन का कार्यक्रम भी था . इसके पहले कुछ छोटे मोटे प्रतिस्पर्धा का भी कार्यक्रम था , सामाजिक कार्य के नाम पर बहुत चन्दा इकट्ठा किया गया था
आनंद से अभिभूत एक नन्ही बालिका अपने पिता  के समीप आकर कहा --देखो न पिताजी , कितना मजा आ रहा है न? क्या ऐसा हमेशा नहीं हो सकता कि सब लोग इसी प्रकार मुखौटे   लगाये दूसरो को बुद्धू बना कर मजा ले?
         भोली बच्ची द्वारा अज्ञानता में कही गयी बातो में एक यथार्थ छुपा था।  पिता कुछ क्षण शांत होकर सोंचने लगे - मेरी भोली बच्ची तुझे कैसे समझाऊ , आज हर चहरे पर एक मुखौटा चढ़ा हुआ है और वह दूसरो को बेवकूफ बनाते हुए अपना स्वार्थ सिद्ध किये जा रहा है।

समाज सेवा :-
     वह पहली बार इस सामाजिक संगठन के सम्मलेन में आया था।  उसके धंधे से रोटी कमाने से फुरसत नहीं मिलाती थी।  अबकी बार बड़ी मुश्किल से समय निकाल पाया। पहले उसके छोटे शहर से बहुत लोग आया करते थे। अब उसके शहर से बहुत कम ही लोग आते है।  स्टेज में बड़े बड़े लोग बैठे थे। एक दूसरे के प्रशंसा के गुण गाये जा रहे थे -एक दूसरे का अभिनन्दन कर रहे थे -एक दूसरे को तिलक लगाकर माला भी पहना रहे थे। कार्यक्रम समाप्ति के बाद उसने पडोसी स्वजातीय बंधू से पूछा -- इन्होने क्या क्या समाज सेवा की है जो इतनी तारीफ़ हुई ? बंधू ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया ----ये लोग बड़े समाज सेवक है , समाज में बहुत नाम है इनका , समाज सेवा में करीब सौ बार स्टेज में भाषण दिया है , दो सौ बार तिलक और मालाओ से अपना सम्मान करवाया है , उस नए व्यक्ति को अब समझ में आ गया कि उसके शहर से पुराने लोग क्यों कटकर आना बंद कर दिए।
धार्मिकता
वे बहुत धार्मिक व्यक्ति है , मंदिर के कायर्क्रमों , समाज के कार्यक्रमो,साधुसेवा में आगे रहते है।  समाज के लोग बहुत सम्मान देते है। पिछले वर्षों  उसकी पत्नी पांच बार गर्भवती हुई , पर लडकी भ्रूण होने के कारण गर्भपात करवा दिया , भले ही ये पाप होता हो। अब लड़का होने पर संतोष की सांस लिया। बाद में मंदिरो में अनेक बार दान किया , शायद बोली लगाकर (शायद पाप धोने ) , अहिंसक समाज में अनेक लोगो ने ऐसा ही किया था . लडकियो की कमी हो गयी  तो अब समाज की चिंता करते हुए इधर उधर सम्मलेन करते फिर रहे है (आखिर उन्हें अपने लडके की भी शादी भी तो करनी है , लडकी है कि मिल नहीं रही )


यमराज की उलझन : Yamraj's Confusion (Hindi)

                                                                                                                                                          यमराज की उलझन   रेणीक बाफना , रायपुर    
                                                                                                                                                         
यमराज के चीफ एकाउंटेंट चित्रगुप्त आजकल बहुत टेंशन में रहने लगे थे  दरअसल धर्मराज के यहाँ हिसाब किताब करते काफ़ी साल हो गए थे। तनखा भी नहीं बढ़ी थी  तिस पर अत्याधिक लोगो के मरने के कारण खाता बही का काम बहुत बढ़ गया था , सुपर कंप्यूटर (पेंटियम 100 ) होने के बाद भी आखिर डाटा एंट्री तो उन्हें ही तो करना पडता था।  एक दो बार अपनी परेशानी उसने यमराज से कही थी  परन्तु नेताओ की संगत से वे भी पहले जैसे नहीं रहे कोरा आश्वासन देकर टाल दिया।  आखिर एक दिन सब्र का बाँध टूट ही गया चित्रगुप्त ने कलम बंद हड़ताल कर ही दी -मांग रखी ()-तनखा बढ़ाओ (2) असिस्टेंट भी चाहिए  अकेला कितना खटता रहूंगा । यमराज परेशान - ढेरों मृत लोगो का हिसाब किताब पेंडिंग होने से यमलोक ही धर्मशाला बन गयी - किसे स्वर्ग और किसे नरक भेजना है निर्णय नहीं हो पा रहा था।  यमराज ने कुछ झूठे सच्चे आश्वासन का चारा फेंका  पर सब बेकार। चित्र गुप्ता टस से मस नहीं हो रहे थे।अब जांच करने यमराज ने अपनी सर्वे टीम भेजी आखिर वर्क लोड इतना कैसे बढ गया  इतने लोग कैसे मरने लगे कि यम लोक में असिस्टेंट की जरूरत पड़ गयी।  सर्वे टीम ने जांच कर बताया हुजूर नमूने के तौर पर हमने छत्तीसगढ़ की सड़के देखी। गडढे ही गढढे है बिना डामर की सड़के बनायी जा रही है नयी बनी सडको पर भी कुछ दिनों में ही अनगिनत गड्ढे  हो जाते है फलस्वरूप दुर्घटनाये बढ़ गयी है और ज्यादा जानवर और आदमी मरने लगे हैं इसलिए यमलोक की आवक बढ़ गयी है। यमराज ने पूछ ऐसा क्यों ---- जांच दल ने बताया सारे राज्य और देश में भ्रष्टाचार बहुत बढ गया है ठेकेदारो ने घटिया सड़क बनाई - कभी कभी डामर भी नहीं डालते या फिर जला तेल मिलाकर सड़क बना देते है लोगो को दिखाने कि डामर डाल दिया गया है सीमेंट की सडको पर केवल रेट व गिट्टी  डालकर उस पर सीमेंट व रेट का लेप चढ़ा देते है। फिर बहाना बनाते है कि बरसाती पानी से डामर घुल गया  मुर्ख जनता चुप रहती है सच मानकर.
      यमराज ने क्रोधित हो ठेकेदारो की आत्माओ को बुलाकर डांट पिलाई तो उन्होंने अर्ज किया ---क्या करे हुजूर सरकारी विभागो में पच्चीस से तिस प्रतिशत कमीशन फिक्स है मंहगाई भी बेहद बढ़ी हुई है कॉम्पिटिशन के चलते कम से कम रेट में टेंडर भरने पर ही काम मिल पाता है फिर कमीशन के अलावा छुटभैये नेताओ ब्लैकमेलर पत्रकारो का भी पेट भरना पडता है विभिन्न विभागो के सरकारी अफसरो को भी खुश करना पडता है इस तरह पचास प्रतिशत यों ही खर्च हो जाता है हमें भी जुगाड़ करना है परिवार के लिए। फिर टेक्स आदि भरते  और उनका चढ़ावा चढ़ाते बीस प्रतिशत और खर्च हो जाते है  अब बचे तीस प्रतिशत में कैसे सड़के बनेगी इसमे केवल गिट्टी और रेट ही तो डलेगा 
       ये सब सुन यमराज ने डिपार्टमेंट के इंजीनियरों की आत्मा को नरक से बुलवा भेजा - डांट के बाद उन्होंने भी सफाई पेश की ----क्या करे साहब ठेकेदारो से मिला हिस्सा ऊपर के ऊपर के अधिकारियो को भी पहुँचाना पडता है बचे पैसो से दाल रोटी का इंतजाम भी हो जाता है। सभी नेताओ और पत्रकारों को भी खुश करना पडता है कइयो को तो महीना भी बांधना पडता है - कभी कभी नेताओ द्वारा मांगी गयी राशि देने केवल कागजों में ही काम दिखाना पडता है  ऐसे में भ्रष्टाचार मजबूरी है- न करे तो ड्राई एरिया में भेजने या सस्पेंड होने का भय बना रहता है 
      अब यमराज ने नेताओ की आत्मा को घोर नरक से पकड़कर बुलवाया डॉट फटकार के बाद उन्होंने भी उगलना शुरू किया ---- हुजूर देशसेवा जनसेवा के महान उद्देश्य से हमने नेतागिरी शुरू की थी -पर पब्लिक का भष्टाचार देखकर ही हमें अपना रंग ढंग बदलना पड़ा -जिन नेताओ ने देश की आजादी के लिए सब कुछ स्वाहा कर दिया -जिन सिपाहियो ने देश की रक्षा के लिये अपनी जान भी गँवा दी -उनके परिवारो का दुःख सुख पूछने वाला जनता में कोई शख्श नहीं रहा -और तो और हुजूर जनता चुनाव के समय दारु मुर्गा बकरा सूअर चांवल की बोरियां जैसी चीजो की मांग करती है तभी वोट देने को तैयार होती है उच्च वर्ग वोट देने जाना पसंद नहीं करता -गरीब लोगो द्वारा शराब की बदबू फैलाते लोगो के लाइन में खड़ा होने से इज्जत घट जायेगी -माध्यम वर्ग कुछ वोट देते है कुछ नहीं -गरीब वर्ग अपना लालच पूरा करने के बाद ही वोट देने जाता है -अनाप शनाप चुनावी खर्च करना पडता है -बाद में यही खर्च वसूलने सरकारी धन जो जनता से करो के रूप में वसूला जाता है उसका गबन करना पडता है इंजीनियरों को धमकाना पडता है क्या करे ये हम लोगो की मजबूरी है 
       यह सब सुनकर यमराज जी  चक्कर  खा गए इनमे से कोई भी दोषी नहीं तो दोष किसको दे -आखिर अपने अराध्य महाकालेश्वर भगवान शंकर के पास जा पहुंचे - भगवान शंकर ने अपना नेत्र खोला और मुस्कुराते हुए बोले ----हे यमराज मै जानता हू तुम किस उलझन को लेकर आये हो -यमराज ने निवेदन किया--- हे प्रभु आप सब कुछ जानते हो तो इन सबका कल्याण कीजिये - इस पर सर्वज्ञानी शंकर जी बोले ---- हे यमराज जिस देश के लोग आजादी के साठ  साल बाद भी दारु मुर्गा बकरा चावल आदि के बाद वोट डालने जाते हो  या वोट डालने जाना पसंद नहीं करते हों- अपने अधिकारो का दुरुपयोग करते हो-उनका भला तो मैं भी नहीं कर सकता --उन्हें उनके हाल पर छोड़ दो -सडको पर -गन्दी बस्तियों में और गाँवों में असुविधाओ के साथ मरने दो - यही उनके कर्मो का दुष्परिणाम है -इसकी बजाय तुम चित्रगुप्त को डेली वेजेस वाला असिस्टेंट दो -और चित्रगुप्त  का वेतन भी बढ़ा दो ताकि यमलोक का कार्य सुचारू रूप से चल सके  
                                                                                                   

गुरुवार, 24 अक्टूबर 2013

डॉ ईश्वर रमानी- Extra Ordinery Wise !!

डॉ  ईश्वर रमानी-                        













एक कहावत है , करेले पर नीम  चढ़ा , यानी और कड़वा, ज्यादा प्रभावकारी औषधि  ! इसी तरह एक एलोपैथी का डॉक्टर , तिस पर अनेक वर्षो की प्रेक्टिस  और बाद में होमियोपैथी की प्रेक्टिस , ऐसे डॉक्टर,  तो साधारण होमियोपैथी के डॉक्टर से भी की गुना काबिलियत रखते  हैं।  डॉ ईश्वर रमानी ऐसे ही हैं।  फिर सैद्धांतिक प्रेक्टिस यानी मरीजो को हमेशा सच बताना।, साफ़ साफ़ यही कारण है कि मेरे जैसे नियमित संपर्क वाले व्यक्ति को भी होमियोपैथी पढने का शौक चर्रा  गया। मेरे जैसे की और लोग है जो डॉ साहब की वजह से होमियोपैथी का काफ़ी ज्ञान रखने लगे।  इसा सब का फ़ायदा यह हुआ कि अनेक लोग अब एलोपैथी की जहरीली दवाइयो से बचने लगे। और कइयो को बचाने भी लगे , एक क्रान्ति जैसी शुरू हुई, लूटमार भी कम हुई।  कांकेर शहर में होमियोपैथी की आंधी इन्होने ही चलाई है ,इन्ही को श्रेय जाता है इस पैथी को लोकप्रिय बनाने में !
 नए होमियो पैथ  जिन्हे "केंट" की किताबो के मानसिक लक्षण समझ में नही आते आसानी से क्योकि अन्ग्रेजी में होते है और एक शब्द के की अर्थ होते है उसके लिए एक किताब भी उन्होंने लिखी - " हमारी मनोग्रंथिया ". वे अपने शिष्यो को भी समझाते रहे उन्हें देते रहे। ये शिष्य होमियोपैथी के डिग्रीधारी डाक्टर होते है जो उनकी होमियोपैथी थ्योरी को समझने  में  सक्षम होते है। (होमिओपॅथी में मानसिक लक्षणो का बहुत महत्व है ) ये किताब डाक्टर साहब के पास ही उपलब्ध है।

बुधवार, 23 अक्टूबर 2013

डां. ईश्वर रमानी जैसा मैंने पाया : Dr. ISHWAR RAMANI-As I found

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Dr.Ishwar Ramani

 डां. ईश्वर रमानी  जैसा मैंने पाया 

                                                                      


निवास:सेक्टर 5 गली नम्बर ,-भिलाई (छ्ग़.)
डा. साहब को मै काफ़ी समय से जानता हूं , मेरे विचार से सैकडों / हजारों में एक  ऐसे रहते है , एक तो  एम.बी.बी.एस , तिस पर  होमियोपैथी की प्रेक्टिस !! एक एलोपैथी का डाक्टर जमी जमाई प्रेक्टिस को छोड़कर होमियोपैथी करने लगे तो आश्चर्य तो होगा ही , ऐसा बहुत कम लोग कर पाते है। दरअसल खोजी कीड़ा बहुत कम लोगो के दिमाग में कुलबुलाता है. हजारों डाक्टर डिग्री लेने के बाद केवल पैसा कमाने पर ही ध्यान देते आये, पर ये जीव तो अलग ही निकला। इसके पीछे भी रोचक कहानी है. कांकेर (बस्तर) में मलेरिया के मरीज आते ही रहते थे., एक बार एक मरीज आ गया जिसका इलाज डां साहब ने करना शुरू किया , पर दुर्भाग्य से एलोपैथी की चारो -पांचो दवाईया असफल हो गयी , इधर वो मरीज लगातार आते रहा था, इसके बाद तो तो ये परेशान  हुए।  अब क्या करे. उन्होंने ने होमियोपैथी का प्रयोग कर देखा , और आश्चर्यजनक रूप से मरीज ठीक हो गया , ब्लड टेस्ट भी कराकर निश्चित किया. इसके पहले एलोपैथी  डाक्टरों की तरह होमियोपैथी पर ज़रा भी विश्वास नही करते थे. (होमियोपैथी के जनक डां  हनीमैन  भी एलोपैथी के डाक्टर थे जिन्होंने होमियोपैथी की खोज की , वह भी मलेरिया की दवा से ही शुरू हुआ.). बस्तर में जो मलेरिया विकसित हुआ था उसमे मलेरिया की लगभग सारी दवाईयों का प्रतिरोध विकसित हो गया था। इसके बाद रमानी जी ने कुछ और मरीजो पर होमियोपैथी आजमा कर देखना शुरू किया , और सफल रहने बाद झुकाव बढने लगा। पथरी आदि रोगों पर आज़माने के बाद तो जैसे नए प्रयोगों का भूत सवार हो गया। हजारो रुपयों की किताबे खरीद कर उन्हे पढने में डूब गये. वैसे भी जानते थे की एलोपैथी में अनेक रोगों का इलाज नही, पर धंधे के कारण दवाईयाँ  देना डाक्टरों की मजबूरी रहती है, जिसका साईड इफ़ेक्ट भी होता है.
                              एक दवा दो,  एक मर्ज ठीक हुआ , अब दवाईयों  की वजह से जो साईड इफेक्ट  हुआ, उसका इलाज शुरू हो जाता था , पर ये सच्चाई बताई भी नही जा सकती मरीजो को, इससे गलत बाते फ़ैलने लगती। दूसरे डाक्टरों को कुप्रचार करने का मौक़ा मिल जाता। आखिर दिमाग बदल ही गया , १२ साल से जमी जमायी एलोपैथी की प्रेक्टिस किनारे कर पूरी तरह से होमियोपैथी से ही मरीजो को ठीक करने में लग गये (ऐसा कोई करने का साहस विरले ही कर सकते है ! ).   अब कोई एलोपैथी के लिए जिद करता तो मुफ्त में दवाई लिखाकर दे देते, पैसा नही लेते उसका. यह बात 1994 के लगभग की है , तब से ये सिलसिला चला ही आ रहा है होमियोपैथी का . आजा के जमाने में पैसे के पीछे न भागने और केवल लक्ष्य के पीछे भूत बनकर पडे रहने वाले डाक्टर विरले ही होते है.
                  इनकी विद्वता को कुछ लोग ही जानते थे जो काफ़ी निकट से जानते थे और समझदार वर्ग के थे  . हम लोग कहा करते थे की रमानी, कांकेर जैसे छोटे शहर के लायक नही, इनका महत्व  तो बडे शहरों में आंका जा सकता है.  ऐसा प्रायोगिक दिमाग के विरले ही होते है.
                 मेरे सामने एक धर्म संकट भी आने लगा. दरअसल पहले तो मै एक मरीज के रूप में ही जाता था, पर पहचान बेहद पुरानी होने लगी दोस्त की तरह, तो पैसे देने में मै कतराने लगा ,कि  मित्रता के बीच पैसे का व्यवहार अच्छा नही , आखिर पैसा  ही तो खून के रिश्ते को भी बिगाड देता है, अत: किसी का भला कर देना मेरे नाम से, इस बहाने से मै  एक मुश्त राशि देने लगा, बिना हिसाब के। इससे  मित्रता पर कोई आंच न आया. जैसे सभी मित्रो से मेरा व्यवहार बना रहता है, वैसे इनसे भी बना रहा. इनकी एक खासियत और भी देखता रहा, साधारण केसेस में  रूचि लेने की बजाय चुनौतीपूर्ण मामले में इन महाशय को ज्यादा ग्लैमर नजर आता है, जिसमे संतुष्टि  भी मिलती है। और यही है विद्वता की पहचान ! धन की बजाय विद्या पर अधिक ध्यान ! मुझे गर्व होता है की डां. ईश्वर रमानी जैसा व्यक्ति मेरा मित्र है.