भागवत कथा में शामिल करने योग्य बाते :-
अगर कथा वाचक कथा करते समय कुछ निम्न बातो की शिक्षा भी देना शामिल कर लेवे तो कम पढ़ी लिखी भारतीय जनता का सामाजिक मार्गदर्शन हो जाएगा और देश का उद्धार हो जाएगा पर दुर्भाग्य से ऐसा हो नहीं रहा।
1 - हिन्दू धर्म यानी धर्म हजारो वर्ष पुराना है , जैन व बौद्ध धर्म 2500 वर्ष पुराने है , सिक्ख धर्म 400 -500 वर्ष पुराना है , इस्लाम 1400 वर्ष तथा ईसाई २००० वर्ष पुराने है , जब ये नए धर्म नहीं थे तब क्या था ? कृष्ण काल व् रामायणकाल में कौन सा धर्म था ? उस समय सिर्फ धर्म और अधर्म था और ये धर्म सनातन धर्म ही था। ये बात सही है कि काल के प्रभाव से इसकी मान्यताओ में विकृति आयी परन्तु ये मानने वालो का दोष था। धर्म तो आज भी पवित्र है , माननेवाले व्याख्या अलग -अलग करते है।
२- हिन्दू धर्म में गाय को माता कहा गया है , परन्तु अपने आप को हिन्दू कहने वाले शहरो में जहा चरागाह नहीं वहा गाय पालते है और उनको लावारिस छोड़ देते है , बेचारी भूखी प्यासी गाय माता प्लास्टिक की थैलिया आदि जहरीले पदार्थ खाती है और सडको पर रात भर बैठती है। फिर उन गायोकी मौत बीमारियो से या सड़क पर ट्रको के नीचे दबकर हो जाती है। गाय माता की हत्या का दोष किस पर आयेगा ? ट्रक वालो पर , प्लास्टिक कचरा फेंकने वालो पर ? सबसे बड़ा दोष शहरो में गाय पालने वालो को आयेगा क्योकि बिना चरागाह के , उन्हें दाना पानी दिए भूखो मरने छोड़ने वाले हिन्दू ही गाय माता के हत्यारे कहलायेंगे।
३- अपने को भगवान के भक्त कहने वालो की कमी नहीं इस दश में , परन्तु कर्म उलटा। वर्षो से भगवानो के चित्र वाले अगरबत्ती , मसाला , अनाज आदि घरेलु चीजे खरीदते आ रहे है फिर पैकेट खाली कर उन चित्रो को नालियो , टट्टी पेशाब की गन्दी जगहो पर फेंक देते है , सोंचो एक तरफ आप अपने को भगवान राम, कृष्ण , हनुमान के भक्त मानते हो , दूसरी तरफ उनके फोटुओ को नालियो में फेंकते आ रहे हो ? यही है आपकी भक्ति ? क्यों नहीं आप उन वस्तुओ को जिनकी पैकिंग पर ये चित्र छपे हो , खरीदना बंद कर देवे , दूसरो को भी मना करे , साथ ही धंधे वालो को भी ऐसी वस्तुए बेचने से मना करे और निर्माताओ को भी विरोध पात्र लिखे और प्रचार करे ।
अगर कथा वाचक कथा करते समय कुछ निम्न बातो की शिक्षा भी देना शामिल कर लेवे तो कम पढ़ी लिखी भारतीय जनता का सामाजिक मार्गदर्शन हो जाएगा और देश का उद्धार हो जाएगा पर दुर्भाग्य से ऐसा हो नहीं रहा।
1 - हिन्दू धर्म यानी धर्म हजारो वर्ष पुराना है , जैन व बौद्ध धर्म 2500 वर्ष पुराने है , सिक्ख धर्म 400 -500 वर्ष पुराना है , इस्लाम 1400 वर्ष तथा ईसाई २००० वर्ष पुराने है , जब ये नए धर्म नहीं थे तब क्या था ? कृष्ण काल व् रामायणकाल में कौन सा धर्म था ? उस समय सिर्फ धर्म और अधर्म था और ये धर्म सनातन धर्म ही था। ये बात सही है कि काल के प्रभाव से इसकी मान्यताओ में विकृति आयी परन्तु ये मानने वालो का दोष था। धर्म तो आज भी पवित्र है , माननेवाले व्याख्या अलग -अलग करते है।
२- हिन्दू धर्म में गाय को माता कहा गया है , परन्तु अपने आप को हिन्दू कहने वाले शहरो में जहा चरागाह नहीं वहा गाय पालते है और उनको लावारिस छोड़ देते है , बेचारी भूखी प्यासी गाय माता प्लास्टिक की थैलिया आदि जहरीले पदार्थ खाती है और सडको पर रात भर बैठती है। फिर उन गायोकी मौत बीमारियो से या सड़क पर ट्रको के नीचे दबकर हो जाती है। गाय माता की हत्या का दोष किस पर आयेगा ? ट्रक वालो पर , प्लास्टिक कचरा फेंकने वालो पर ? सबसे बड़ा दोष शहरो में गाय पालने वालो को आयेगा क्योकि बिना चरागाह के , उन्हें दाना पानी दिए भूखो मरने छोड़ने वाले हिन्दू ही गाय माता के हत्यारे कहलायेंगे।
३- अपने को भगवान के भक्त कहने वालो की कमी नहीं इस दश में , परन्तु कर्म उलटा। वर्षो से भगवानो के चित्र वाले अगरबत्ती , मसाला , अनाज आदि घरेलु चीजे खरीदते आ रहे है फिर पैकेट खाली कर उन चित्रो को नालियो , टट्टी पेशाब की गन्दी जगहो पर फेंक देते है , सोंचो एक तरफ आप अपने को भगवान राम, कृष्ण , हनुमान के भक्त मानते हो , दूसरी तरफ उनके फोटुओ को नालियो में फेंकते आ रहे हो ? यही है आपकी भक्ति ? क्यों नहीं आप उन वस्तुओ को जिनकी पैकिंग पर ये चित्र छपे हो , खरीदना बंद कर देवे , दूसरो को भी मना करे , साथ ही धंधे वालो को भी ऐसी वस्तुए बेचने से मना करे और निर्माताओ को भी विरोध पात्र लिखे और प्रचार करे ।
4 -बौद्ध और जैन धर्म सनातन धर्म की शाखा है परन्तु धर्म व् समाज के कुछ दुकानदार इन धर्मो को हिन्दू से अलग कहते है। अलग कैसे है ? क्या भगवान बुद्ध ने दुर्गा देवी के एक रूप तारा देवी की भक्ति नहीं की थी , जहा स्वयं बुद्ध देवी उपासक थे वे अब हिन्दू धर्म से अलग कैसे हो गए ? और जैन धर्म वाले जो हर मंदिर में भैरव जी जो शंकर जी के गण है, की उपासना करते है, इसी तरह अम्बिका देवी यानी दुर्गा , पार्श्व यक्ष यानी गणेश भगवान ,पद्मावती देवी यानी लक्ष्मी माता की उपासना करता है, वह हिन्दू धर्म से अलग कैसे हो सकता है? सिक्ख धर्म में गुरु अर्जुनदेव की कथा में भगवान विष्णु लक्ष्मी देवी सहित स्वर्ण मंदिर के निर्माण के होने की कथा है ,और गुरु गोविन्द ने तो मुगलो का सामना करते समय विजय के लिए देवी दुर्गा की उपासना की थी। अगर सिख धर्म की ये कथाये झूठी नहीं तो सिक्ख धर्म और हिन्दू अलग अलग कैसे हुए ? ये सब ऐसे ही है जैसे हनुमान भक्त राम विरोधी कैसे हो सकता है ? या राम भक्त शिव विरोधी कैसे हो सकता है ? इन सभी धर्मो के अनुयायी विवाह के बाद मांग में सिंदूर भरते है , हाथो में चूड़िया पहनते है, अग्नि के फेरे लेते है , भगवान की पूजा में फूल धुप अगरबत्ती का प्रयोग करते है , फिर हिन्दू से कैसे अलग हुए ? राजनीति व् स्वार्थ ने इन्हे अंधा कर दिया है।
5 - आजकल ईसा मसीह के अनुयायी हिन्दुओ को बरगलाने में व धर्म परिवर्तन कराने में लगे हुए है। विदेशी इशारो पर भोले भाले हिन्दू ग्रामीणो को धन का लालच देकर तथा उलटे सीधे तर्क देकर भड़काते है। सच तो यह है हिन्दू धर्म यातना महान है कि किसी भी देवी देवता का अपमान न करने की शिक्षा देता है चाहे आप उसे मानते हो या नहीं। हिन्दुओ के लिए तो हर महात्मा पूजनीय है परन्तु अन्य धर्मवाले अपने धर्म को मानने व् दूसरे धर्म के प्रति घृणा करने की शिक्षा ही देता है। किसी ईसाई फादर या नन को मंदिर में पूजा करते देखा है? किसी मुसलमान को किसी मंदिर या चर्च के सामने सर झुकाते या मंदिरो का प्रसाद खाते देखा है ? शायद कभी नहीं ! और देखोगे भी नहीं ! दोष ईसा मसीह में नहीं उसके माने सालो में है , ईसा तो महात्मा था , धर्म देश हिंदुस्तान से शिक्षा दीक्षा लेकर अपने देश गया धर्म की शिक्षा देने क्योकि वहा चारो और अधर्म और पाप फैला हुआ था . उसके इस कार्य से क्रोधित हो लोगो ने सूली पर ही चढ़ा दिया -क्रूरता पूर्वक मार डाला ! बाद में क्रूरता की निशानी सूली यानी क्रास को ही पवित्र चिन्ह बना डाला। ज़रा सोंचिये - मोहम्मद को तथा गुरु गोविन्द सिंह को दुष्टो ने तलवार से मारा डाला तो क्या तलवार पवित्र चिन्ह या धार्मिक चिन्ह बनना चाहिए? कल को किसी पॉप या फादर को किसी अलकायदा के हिंसक सदस्य ने जूतो से पिटाई की तो क्या जूता पवित्र चिन्ह माना जाएगा ? शायद ईसाई मानेंगे !
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