मंगलवार, 5 नवंबर 2013

टुकड़ो टुकड़ो में बंटता जैन धर्म : Jain Religion cut into Pieces (Hindi)


SHRI JITENDRA JAIN(Doshi)
RENIK BAFNA

टुकड़ो टुकड़ो में बंटता जैन धर्म 
लेखक -रेणीक  बाफना , रायपुर (छ.ग. )
                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                           

यूँ  तो जैन धर्म भारत की जनसंख्या का सिर्फ ०. प्रतिशत से १. प्रतिशत ही बताया जाता है। ये प्रतिशत तो तब है जब साड़ी शाखाओ उपशाखाओ को एक माना जाए, अन्यथा दिगंबर ,श्वेताम्बर , स्थानकवासी के अलावा खरतरगच्छ , तपॊगच्छ आदि अनेक टुकड़े है जिनका प्रतिशत निकाला जाए तो.… ……… …… ? चलिए ज़रा इतिहास में ताक झाँक करे आखिर ये टुकड़े क्यों और कैसे हुए !

प्रथम विभाजन :- भगवान महावीर स्वामी के बाद क्रमश: गौतम , गांधार , सुधर्म स्वामी , जम्बू स्वामी का ६२ वर्ष का कार्यकाल ६२ वर्ष का रहा ते तीन केवली कहलाते थे।  तो विष्णुकुमार , नदी मित्र , अपराजित , गोवर्धन एवं भद्रबाहु आदि पांच श्रुतकेवली हुए जिनका कार्यकाल लगभग १०० वर्षो का हुआ।  इस प्रकार महावीर स्वामी के १७० वर्ष बाद आचार्य भद्रबाहु का स्वर्गवास हुआ . परन्तु इनके कार्यकाल में जैन पंथ के विभाजन का बीजारोपण हो चुका था म इसलिए भद्रबाहु को दिगंबर और श्वेताम्बर दोनों सम्प्रदाय मानते है। 



                                    मतभेद का कारण सम्भवत: यह था  कि कुछ साधुओ के मन में यह विचार आया चूँकि उन्हें आहार के लिए ग्राम व् नगर सांसारिक लोगो के बीच जाना पडता है , अत: उन्की मर्यादा , लज्जा का ख्याल रखा जाना चाहिए।  साधना तपस्या मन की होती है तन की नहीं।  अत: उनके बीच जाते समय श्वेत वस्त्र से शारीर को ढकने में कोई बुराई नहीं , जानकी कुछ परम्परा में कोई परिवर्तन करने के सख्त विरुद्ध थे।  इससे साधू समाज दो भागों दिगंबर और श्वेताम्बर में विभाजित हो गया।

द्वितीय विभाजन :-
जैसा कि हर धर्म में हुआ , लोभ या दिखावा करने की प्रवृत्ति मानवीय स्व्भाव में है , मूर्तिपूजन की पद्धत्ति (जो कि दिगंबर श्वेताम्बर दोनों में थी )में की कर्मकांड , विधि,,परम्पराए आदि जुड़ती चली गयी , यहाँ तक कि सर्वस्त्र त्यागी तीर्थंकरो को भी उन्ही कर्मकांडो में लिप्त कर दिया।  साधुओ के मन में विचार कि ईश्वर तो अनत: निराकार है।  साधना में मूर्ति आदि तो भौतिक वस्तुओं का प्रयोग तो स्वयं तीर्थंकरो ने भी नहीं किया , अत: व्यर्थ के कर्मकांडो को जो बाद में जोड़े गए उनका त्याग करना ही उचित होगा और निराकार उपासना पद्धति को अपनाने से ये किनारे हो जायेंगे। वस्तुत: जैन पंथ की पद्धति तत्कालीन हिन्दू धर्म का सुधारवादी पद्धति ही थी क्योकि हिन्दू धर्म में एक वर्ग द्वारा अपने स्वार्थ पूर्ति के लिए अनेक कर्मकांडो व् ढकोसलों को जोड़ा गया था। जिससे लोग त्रस्त  थे। इसके विपरीत कुछ साधू लोग साकार उपासना से जुड़े रहना चाहते थे ताकि ध्यान , कल्पना का एक माध्यम बना तो रहे। लोगों  का जुड़ाव भी धर्म से बना रहे।  दोनों तर्क अपनी जगह वजनदार थे , परन्तु विभाजन की नीव पद ही गयी - साकार और निराकार उपासना पद्धति के आधार पर क्रमश: मंदिरमार्गी और स्थानकवासी। (इसी प्रकार मुस्लिम एवं सिक्ख धर्म निराकार उपासना एवं ईसाई धर्म साकार उपासना पर आधारित है , सनातन  धर्म जो मातृ धर्म कहलायेगा , में दोनों पद्धतियाँ सामान रूप से प्रचलित है, परिस्थितिया और परम्परा के अनुसार )

तृतीय विभाजन :-
स्थानकवासी में कड़े नियम बना रखे थे जो उस काल की आवश्यकतानुसार थे , परन्तु देश काल में परिवर्तन होते रहता है अत: अनेक साधुओ के मन में पुन: विचार आया, जिन नियमो की प्राचिकाल में जरूरत थी , बदली हुई परिस्थितियो में उसकी आवश्यकता नहीं। जैसे पहले साबुन पशुओ की चर्बी से बनाई जाती थी , बाद में केवल वनस्पति तेलो से ही बनाने लगे इत्यादि अत: साबुन से नहाना धर्म विरुद्ध घोषित करने की जरूरत नहीं रह गयी।  इसके विपरीत अनेक साधू परम्पराओ या प्रतिबंधो में किसी भी परिवर्तन के विरुद्ध थे , फलत: पुन: विभाजन की नीव पड़ी - स्थानकवासी एवं दिगंबर से अलग हुआ तेरापंथी और तारापंथी
   
   अब जैनियों के चार दुकड़े हो चुके थे - दिगंबर , श्वेताम्बर , स्थानकवासी और तेरापंथी।  परन्तु सिलसिला चलता रहा और गच्छ के आधार पर -उपकेश गच्छ ,तपागच्छ ,कोरंटगच्छ , रुद्रपंथी गच्छ , शंखेश्वर गच्छ ,जैसे अनेक टुकड़े टुकड़े कर दिए।  यही हाल तेरापंथ और स्थानकवासी में भी हुए गुटीय आधार पर।
                                                                              

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