मंगलवार, 5 नवंबर 2013

मुखौटा : Mukhouta (Hindi)

मुखौटा
सामाजिक सम्मेलन चल रहा था , सभी अपने चहरो पर मुखौटा (शायद समाज सेवा का ) लगाए हुए एक दूसरे को टोपी पहनाने का मौका ढूंढते हुए , दूसरो के कंधो के सहारे बन्दुक चलाने का मौका ढूढते हुए , आनद लूट रहे तेह।  सभी आपस में एक दूसरे को तिलक लगाते हुए , माला पहनाते हुए अभिनन्दन कर रहे थे , इसके बाद भोजन का कार्यक्रम भी था . इसके पहले कुछ छोटे मोटे प्रतिस्पर्धा का भी कार्यक्रम था , सामाजिक कार्य के नाम पर बहुत चन्दा इकट्ठा किया गया था
आनंद से अभिभूत एक नन्ही बालिका अपने पिता  के समीप आकर कहा --देखो न पिताजी , कितना मजा आ रहा है न? क्या ऐसा हमेशा नहीं हो सकता कि सब लोग इसी प्रकार मुखौटे   लगाये दूसरो को बुद्धू बना कर मजा ले?
         भोली बच्ची द्वारा अज्ञानता में कही गयी बातो में एक यथार्थ छुपा था।  पिता कुछ क्षण शांत होकर सोंचने लगे - मेरी भोली बच्ची तुझे कैसे समझाऊ , आज हर चहरे पर एक मुखौटा चढ़ा हुआ है और वह दूसरो को बेवकूफ बनाते हुए अपना स्वार्थ सिद्ध किये जा रहा है।

समाज सेवा :-
     वह पहली बार इस सामाजिक संगठन के सम्मलेन में आया था।  उसके धंधे से रोटी कमाने से फुरसत नहीं मिलाती थी।  अबकी बार बड़ी मुश्किल से समय निकाल पाया। पहले उसके छोटे शहर से बहुत लोग आया करते थे। अब उसके शहर से बहुत कम ही लोग आते है।  स्टेज में बड़े बड़े लोग बैठे थे। एक दूसरे के प्रशंसा के गुण गाये जा रहे थे -एक दूसरे का अभिनन्दन कर रहे थे -एक दूसरे को तिलक लगाकर माला भी पहना रहे थे। कार्यक्रम समाप्ति के बाद उसने पडोसी स्वजातीय बंधू से पूछा -- इन्होने क्या क्या समाज सेवा की है जो इतनी तारीफ़ हुई ? बंधू ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया ----ये लोग बड़े समाज सेवक है , समाज में बहुत नाम है इनका , समाज सेवा में करीब सौ बार स्टेज में भाषण दिया है , दो सौ बार तिलक और मालाओ से अपना सम्मान करवाया है , उस नए व्यक्ति को अब समझ में आ गया कि उसके शहर से पुराने लोग क्यों कटकर आना बंद कर दिए।
धार्मिकता
वे बहुत धार्मिक व्यक्ति है , मंदिर के कायर्क्रमों , समाज के कार्यक्रमो,साधुसेवा में आगे रहते है।  समाज के लोग बहुत सम्मान देते है। पिछले वर्षों  उसकी पत्नी पांच बार गर्भवती हुई , पर लडकी भ्रूण होने के कारण गर्भपात करवा दिया , भले ही ये पाप होता हो। अब लड़का होने पर संतोष की सांस लिया। बाद में मंदिरो में अनेक बार दान किया , शायद बोली लगाकर (शायद पाप धोने ) , अहिंसक समाज में अनेक लोगो ने ऐसा ही किया था . लडकियो की कमी हो गयी  तो अब समाज की चिंता करते हुए इधर उधर सम्मलेन करते फिर रहे है (आखिर उन्हें अपने लडके की भी शादी भी तो करनी है , लडकी है कि मिल नहीं रही )


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