रविवार, 10 नवंबर 2013

मिडिल क्लास होने का दुख : Sadness of being Middle Class (Hindi)


मिडिल क्लास होने का दुख 
                                        देवियो और देवताओ (बराबरी का ज़माना है इसलिए सम्मान भी बराबर का ) , बहुत दिनों से एक दुःख मन को खाये जा रहा था , सोंचा आज बक ही दूँ , भड़ास निकल जायेगी और दिमाग भी हलका हो जाएगा।  मै  एक मिडिल क्लास का हूँ , इसलिए चुनाव के टाइम कोई वोट मागने और लालच देने नहीं आता।  ये साले मिडिल क्लास वाले बिकाऊ नहीं होते , जो सोंच रखे होते है उसी को वोट देंगे। काश हम भी आरक्षित वर्ग के होते, झोपड़पट्टी वालो की तरह इज्जत होती , चुनाव के समय हमारी इज्जत बढ़ जाती, कोई दारु लेकर, पैसा लेकर आता, हमारी पूछ परख करने, तो कोई कम्बल , साड़िया लेकर आता , हमें गिफ्ट देने।  पर साला हम तो न घर का न घाट का।  विशुद्ध मिडिल क्लास का, बिकाऊ माल नहीं । कौड़ियो की भी इज्जत नहीं ! उन जैसा अल्पसंख्यक होते , हमारा भी धर्म गुरु होता जो वोट देने की अपील करता किसी ख़ास पार्टी को। हमें भी दावते ख़ास मिला करती , लोग सालो साल पूछ परख करते। हमें भी तीर्थ यात्रा में रियायते मिलती, पर नहीं, हमारे वैसे भाग्य कहाँ  ?
                             चुनाव आ  गया , कोई तो मरदूद आये हमसे पूछने , वोट मांगने , फिर कहे वोट के बदले क्या चाहिए - तो हम प्रेम से कहते एल.ई.डी.  टीवी पहुंचा दो हमारे यहाँ , वह भी २८ इंची ! (अब हम अपने स्टेंडर्ड के हिसाब से ही तो मांगेंगे !). वो चुनावी घोड़ा, जो सरपट भागता कि दुबारा वोट मांगने नहीं आता , एक लाख  खर्च एक वोट के लिए ? अब  हम इतने सस्ते भी तो नहीं जो आधा पाँव दारु और पचास रुपयो में ही वोट देने की जुर्रत कर बैठे ! अब तो हाई क्लास जमाने में मोबाईल , टेबलेट और लैपटाप भी बंट रहे  है, तो हमें भी लेने से गुरेज क्यों? हम भी लैपटाप , एल ई डी टीवी  का शौक फरमा सकते है . देश की चिंता किसे है ? पहले खुद , परिवार, फिर पार्टी , फिर पार्टी का टिकट ,देश का नंबर तो आखरी में आता है न? उसके लिए सांसद तो है, वही करे  चिंता, मै अकेले क्यों दुबला होऊ .  और भी लोग तो है उच्च वर्ग के , निम्न वर्ग के तो जनता जनार्दन ! मै तो सिर्फ गर्दन हूँ , जनार्दन नहीं। महगाई बहुत बढ़ गयी है , हमें तो सस्ता चावल भी नसीब नहीं , उच्च वर्ग तो बासमती खा लेता है चाहे किसी भी कीमत पर मिले , कोई फरक नहीं पडता , पर हम धोबी के गधो को मंहगा चावल ही खरीदना पड़ता है।
          सरकार आजकल निम्न वर्ग को एक-दो रुपये किलो चावल बाँट रही है , जगह जगह दारु की दूकान खुलवा रही है ताकि "" वोट बैंक"   भाइयो को पीने दूर जाने का कष्ट न करना पड़े ,  उच्च वर्ग भी तो मलाई खींच रहा है , हमने कौन सी ब्रम्हा जी की भैंस खोल ली थी ,जो हम  मिडिल क्लास वालो को यह दिन देखने पड़  रहे है ? मंझला होने के नाते कुत्ता भी नहीं पूछता !

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