मेरे बचपन का चुनावी अनुभव:
उन दिनों मैं कालेज में पढ़ता था , नगरपालिका का चुनाव आ गया था। पड़ोस के 'काकाजी' पुनः चुनाव में खड़े हुए थे। वैसे पहले से वे पार्षद थे। इस बार कांग्रेस से हमेंशा की तरह टिकट मिली थी , चुनाव चिन्ह था - मुर्गा छाप। पडोसी होने की नाते और घरेलु पहचान होने के नाते उन्होंने हमें चुनाव में कुछ सहायता करने कहा जो हमने स्वीकार कर लिया , (उन दिनों चुनाव में सिर्फ डेढ़ सौ खर्च हुआ उनका ! )
घर के पीछे नदी किनारे घरो की एक लाइन थी जिसमे नदी किनारे बीडी बनाने वाले मजदूर रहा करते थे। बीते साल (लगभग 1976 ) में बीड़ी पत्ते और तम्बाकू की कमी की वजह से बीडी कारखाने वालो ने उत्पादन में कमी करनी पड़ी , जिससे एक कारखाने को तो बंद करना पड़ा , जिससे मजदूर बेरोजगार हो गए, और भूखो मरने लगे । उपास स्वरुप वे काकाजी (पार्षद ) के पास आये और अपनी स्थिति बतायी , साथ ही एक चालु कारखाने में काम दिला देने की बात कहने लगे। काकाजी ने स्वीकार कर लिया। उन्होंने कारखाने के मालिक से बात की तो उन्होंने कहा कि आप कहते है तो रख लूंगा , पर इसके लिए मुझे हेड आफिस का उत्पादन घटा कर , मजदूरो की छटनी करना पडेगा ,काकेर स्थित शाखा में कच्चा माल भेजना पडेगा , और यदि बाद में ये नए भर्ती किये मजदूर, पुराना कारखाना वापस चालु हो गया तो भी छोड़ कर न जाए, नहीं तो हमारा उत्पादन क्रम गड़बड़ा जाएगा , यही शर्त है। काकाजी ने श्रमिको से बात कर उनकी सहमति लेकर स्वीकार कर लिया। कुछ दिन तो सब ठीक ठाक चला , बाद में पुराने कारखाने में कच्चा माल आ गया तो ये नए श्रमिक वापस भाग गए ! अब बीडी कारखाने के मालिक का उत्पादन क्रम गड़बड़ाने पर उन्होंने काकाजी से बात की -देखो महाराज , आखिर वही हुआ न जिसका डर था ! इसीलिये इस वर्ग का कोई भरोसा नहीं , दया भी करना बेकार है ! काकाजी अपना मुंह लेकर रह गए।
अब नए चुनाव की बारी आ गयी थी , काकाजी को भरोसा था कि सभी लोग पहले की तरह साथ देंगे क्योकि पार्षद रहते हुए उन्होंने काफ़ी भलाई का काम किया था। (उन दिनों भ्रस्ट्राचार नहीं था , नगरपालिका गरीब थी , पार्षद ईमानदार हुआ करते थे, पुरानी पीढी के नेता आदर्श होते थे आजकल की तरह नहीं ). उनके विरुद्ध एक मुसलमान ठेकेदार और एक ब्राम्हण ईंट भट्ठे का मालिक खड़ा था। दोनों पहुंची हुई चीज थी। उन्होंने करीब हर घर से एक लड़का रोजी पर चुनाव प्रचार पर रख लिया , इससे उस घर के वोट निश्चित हो गए पैसे की माया है। दूसरे मुसलमान ने अपनी जाति-गत वोटो पर भरोसा किया जो शाश्वत और सदा -सत्य होता है । और नदी किनारे बीडी मजदूरो को पचास पचास रुपये बाँट दिये। (हमारे कथित गरीबो की औकात सिर्फ पचास रूपए और एक पौवा दारु ही है आज भी ). बस इतने में खेल हो गया। अब बीड़ी मजदूर भी काकाजी के घर के सामने से मुंह ढक कर रिक्शे में बैठकर (जो उस उम्मीदवार ने तय किया था ) जाते हुए दिखाई दिए। . खैर उस चुनाव में मात्र ८-१० वोटो से जीत तो गए , पर उन्होंने कहा कि जीत तो गया पर बिना भेदभाव के कार्य करूंगा और इसके बाद चुनाव कभी नहीं लडूंगा ये आखरी बार है , चुनावी खर्चा बढ़ जाएगा तो.…। १९७६ के बाद मैंने फिर कभी किसी पार्टी के लिए कोई कार्य नहीं किया।
इससे मुझे भी पता चला कि अच्छे लोग आगे क्यों नहीं आते ! देश सेवा के नाम से ! जनता ही इस लायक नहीं ! खासकर ये कथित गरीब वर्ग , जिसकी वजह से चुनाव खर्च बढ़ता है , जिसकी वजह से अच्छे लोग आगे आने से डरते है देश भक्ति, देश सेवा के नाम से , और जो लोग आते है लाखो खर्च कर , फिर पांच साल की गुना वसूलने में लग जाते है ! ज़रा सोंचिये कि क्या ये पिछड़ा वर्ग , ये कथित गरीब वर्ग , जो देश दुनिया से बेखबर रहता है , जिसे अंग्रेजो का राज्य हो या राजाओ का या फिर हिटलर का , कोई फर्क नहीं पडता , इनके हाथ में वोट देने का पॉवर होना चाहिए ? जिसकी औकात सिर्फ 'पचास रुपये और एक पाँव दारु ' होता है ! "आप+ मैं =हम" को कोई खरीद नहीं सकता ! इसलिए आज तक किसी प्रत्याशी ने कोई लोभ हमारे सामने नहीं रखा , और हम लोग अपने निर्णय से वोट देते आये। और वोट देने का निर्णय - पार्टी के अलावा अभी तक किये गए कार्य , देश हित आदि बातो को ध्यान में रखकर किया गया। मगर हमारा देश प्रेम उस समय गटर में चला जाता है जब एक मूर्ख व्यक्ति बिना सोंचे समझे , महज एक शराब की छोटी बोतल और चंद रुपयो के बदले वोट दे देता है , लोकतंत्र में गदहे घोड़े की एक ही कीमत होती है ! क्या बैलगाड़ी चलाने वाले को, जिसे कर चलाना नहीं आता , अपनी कीमती कार चलाने देना पसंद करेंगे ? फिर देश तो कार से भी ज्यादा कीमती है , मातृ भूमि ऐसे ही नहीं कहा जाता, जिसमे हम लोग पैदा हुए , पले बढ़े ।
युवा वर्ग सोंचे गम्भीरता से परिवर्तन के लिए ! इसका इलाज यह है - वोटरो की भी योग्यता होनी चाहिए तो भ्रस्ट्राचार खत्म हो जाएगा या बेहद कम हो जाएगा !
उन दिनों मैं कालेज में पढ़ता था , नगरपालिका का चुनाव आ गया था। पड़ोस के 'काकाजी' पुनः चुनाव में खड़े हुए थे। वैसे पहले से वे पार्षद थे। इस बार कांग्रेस से हमेंशा की तरह टिकट मिली थी , चुनाव चिन्ह था - मुर्गा छाप। पडोसी होने की नाते और घरेलु पहचान होने के नाते उन्होंने हमें चुनाव में कुछ सहायता करने कहा जो हमने स्वीकार कर लिया , (उन दिनों चुनाव में सिर्फ डेढ़ सौ खर्च हुआ उनका ! )
घर के पीछे नदी किनारे घरो की एक लाइन थी जिसमे नदी किनारे बीडी बनाने वाले मजदूर रहा करते थे। बीते साल (लगभग 1976 ) में बीड़ी पत्ते और तम्बाकू की कमी की वजह से बीडी कारखाने वालो ने उत्पादन में कमी करनी पड़ी , जिससे एक कारखाने को तो बंद करना पड़ा , जिससे मजदूर बेरोजगार हो गए, और भूखो मरने लगे । उपास स्वरुप वे काकाजी (पार्षद ) के पास आये और अपनी स्थिति बतायी , साथ ही एक चालु कारखाने में काम दिला देने की बात कहने लगे। काकाजी ने स्वीकार कर लिया। उन्होंने कारखाने के मालिक से बात की तो उन्होंने कहा कि आप कहते है तो रख लूंगा , पर इसके लिए मुझे हेड आफिस का उत्पादन घटा कर , मजदूरो की छटनी करना पडेगा ,काकेर स्थित शाखा में कच्चा माल भेजना पडेगा , और यदि बाद में ये नए भर्ती किये मजदूर, पुराना कारखाना वापस चालु हो गया तो भी छोड़ कर न जाए, नहीं तो हमारा उत्पादन क्रम गड़बड़ा जाएगा , यही शर्त है। काकाजी ने श्रमिको से बात कर उनकी सहमति लेकर स्वीकार कर लिया। कुछ दिन तो सब ठीक ठाक चला , बाद में पुराने कारखाने में कच्चा माल आ गया तो ये नए श्रमिक वापस भाग गए ! अब बीडी कारखाने के मालिक का उत्पादन क्रम गड़बड़ाने पर उन्होंने काकाजी से बात की -देखो महाराज , आखिर वही हुआ न जिसका डर था ! इसीलिये इस वर्ग का कोई भरोसा नहीं , दया भी करना बेकार है ! काकाजी अपना मुंह लेकर रह गए।
अब नए चुनाव की बारी आ गयी थी , काकाजी को भरोसा था कि सभी लोग पहले की तरह साथ देंगे क्योकि पार्षद रहते हुए उन्होंने काफ़ी भलाई का काम किया था। (उन दिनों भ्रस्ट्राचार नहीं था , नगरपालिका गरीब थी , पार्षद ईमानदार हुआ करते थे, पुरानी पीढी के नेता आदर्श होते थे आजकल की तरह नहीं ). उनके विरुद्ध एक मुसलमान ठेकेदार और एक ब्राम्हण ईंट भट्ठे का मालिक खड़ा था। दोनों पहुंची हुई चीज थी। उन्होंने करीब हर घर से एक लड़का रोजी पर चुनाव प्रचार पर रख लिया , इससे उस घर के वोट निश्चित हो गए पैसे की माया है। दूसरे मुसलमान ने अपनी जाति-गत वोटो पर भरोसा किया जो शाश्वत और सदा -सत्य होता है । और नदी किनारे बीडी मजदूरो को पचास पचास रुपये बाँट दिये। (हमारे कथित गरीबो की औकात सिर्फ पचास रूपए और एक पौवा दारु ही है आज भी ). बस इतने में खेल हो गया। अब बीड़ी मजदूर भी काकाजी के घर के सामने से मुंह ढक कर रिक्शे में बैठकर (जो उस उम्मीदवार ने तय किया था ) जाते हुए दिखाई दिए। . खैर उस चुनाव में मात्र ८-१० वोटो से जीत तो गए , पर उन्होंने कहा कि जीत तो गया पर बिना भेदभाव के कार्य करूंगा और इसके बाद चुनाव कभी नहीं लडूंगा ये आखरी बार है , चुनावी खर्चा बढ़ जाएगा तो.…। १९७६ के बाद मैंने फिर कभी किसी पार्टी के लिए कोई कार्य नहीं किया।
| ग्रामीणो की भीड़ पर शहरी उच्च वर्ग ? |
| वोट देना अस्पताल जाने से भी ज्यादा जरुरी ? |
| अगर कोई शहरी होता इस हालत में ,तो जाने की जुर्रत नहीं करता ! |
| पैसा ,दारु और मुर्गे की कीमत भी तो चुकानी है ! |
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