मंगलवार, 7 नवंबर 2017

मेरी जैनियो की कुलदेवी पर पुस्तक

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रविवार, 18 जून 2017

ब्राम्हणो से नफरत क्यो??

ये दुसरो के लिखे विचार है,पर दमदार है इसलिए शामिल किया गया लोक कल्याण के लिए---

नफरत सिर्फ ब्राह्मणों के खिलाफ क्यों फैली? नफरत यादव, सुनार, धोबी, कुम्हार या बाकी जातियों के खिलाफ क्यों नहीं फैली? ये एक वाजिब प्रश्न है।

सुनिए जरा...

अगर आप यादव से नफरत करेंगे तो उससे दूध लेना बंद कर देंगे; पर फिर भी हिन्दू रहेंगे।

अगर आप सुनार से नफरत करेंगे तो उससे आभूषण बनवाना बंद कर देंगे; पर फिर भी आप हिन्दू रहेंगे।

अगर आप धोबी, कुम्हार से नफरत करेंगे तो कपड़े धुलवाना और बर्तन खरीदना बंद कर देंगे; पर फिर भी आप हिन्दू रहेंगे।

पर, अगर आप ब्राह्मण से नफरत करेंगे तो तो आप सभी धार्मिक रस्मों जैसे कि जन्म, शादी, मृत्यु के लिए उसके पास जाना बंद कर देंगे और और ये सब रस्में आ कर चर्च का पादरी करेगा।

ब्राह्मणों से नफरत करना यानी
anti-brahminism, 2000 साल पुराने "जोशुआ" प्रोजेक्ट का हिस्सा है जिसका एजेंडा पूरे हिंदुस्तान को ईसाई मुल्क बनाना है। हिंदुओं  का धर्मान्तरण तब तक नहीं हो सकता जब तक वे ब्राह्मणों के संपर्क में हैं।
हिन्दू जातियों में ब्राह्मणों के लिए इतनी नफरत बढ़ाओ की वे ब्राह्मणों के पास किसी भी काम के लिए जाना बंद कर दें और धर्मान्तरण के दरवाजे खुल जाएं।

सबसे पहले ईसाई मिशनरी Robert Caldwell ने आर्यन-द्रविड़ियन थ्योरी बनाई ताकि दक्षिण भारतीयों को अलग पहचान देकर धर्मान्तरण किया जाए, जिसमे उत्तर भारतीयों को ब्राह्मण आर्यन दिखाया गया।

इनकी एजेंडा यहां खत्म नहीं हुआ। इसके बाद दूसरे मिशनरी और संस्कृत विद्वान John Muir ने मनुस्मृति को एडिट किया, इसमें वामपंथियों ने वैसे ही मदद की जैसे कि 26/11 के मुम्बई हमले में भारतीय मुसलमानों ने मदद की।

ब्राह्मण विरोध के चलते अम्बेडकर ने कई हिन्दू जातियों को दलित के नाम से टैग कर दिया जो ब्रिटिश सरकार में डिप्रेस्ड क्लासेज थीं। मंडल कमीशन के ब्राह्मण विरोधियों ने कई जातियों को पिछड़ा घोषित कर दिया जिनके राजघराने तक चलते थे।

ब्राह्मण विरोध, सनातन विरोध का ही छद्म नाम है। क्योंकि ब्राह्मणवाद, मनुवाद तो बहाना है;
असली मकसद हिन्दू धर्म को मिटाना है।

शनिवार, 17 जून 2017

गुंडे को सुधार दिया

मैं बीकॉम में था जबकि मेरा एक मित्र बीए में पढ़ रहा था, बहुत कसरतें करता रहता था,बॉडी बनाना उसका शौक था। पर यहां तक तो ठीक था, उसे शक्ति प्रदर्शन करना भी अच्छा लगता था यानी दादागिरी।
   उसके मोहल्ले में जमादार लोग भी रहते थे जिनकी हरकते भी संस्कारवश वैसे ही रहा करती थी,उनसे मित्र का परिवार भी परेशान रहता था। अक्सर झगड़ा होता रहता था। एक दो बार मेरा दादाछाप मित्र उनको चाकू लेकर मारने भी दौड़ा था। पढ़ने लिखने में रुचि बहुत कम थी।
रोज शाम को मैं कुछ मित्रो के साथ घूमने निकला करता था तो ये दादानुमा मित्र भी मिल जाया करता था। कुछ दिन बाद मुझे सूझा इसकी लाइन ठीक किया जाए यानी सुधार जाए।
           रोज घूमते2 मैं उससे तर्क करने लगा जैसे बताओ तो यार ग्रेजुएशन के बाद क्या करने का इरादा है? तो वह जवाब देता किसी सेठ का बॉडी गार्ड बन जाऊंगा, तनखा भी अच्छी मिलेगी। कसरती बदन का उपयोग भी होगा।फिर मैं उससे पूछता,यदि सेठ पर कोई विपत्ति आयी और हमलावर तुमसे ज्यादा संख्या में हो या ज्यादा शक्तिशाली हो तो? यदि तुम्हे घायल कर दिए या विकलांग कर दिए तो सेठों के किसी काम के नही रहोगे,वे तुम्हे निकाल देंगे,ऐसा भी हो सकता है तुमसे ज्यादा ताकतवर बॉडीगार्ड मिला तो तुम्हे निकालकर उसे रख लेंगे,फिर तुम बेटोजगार हो जाओगे।
इस तरह तर्क वितर्क करने से उसका दिमाग चलने लगा, दादागिरी से मन हटने लगा, फिर दिमाग पढ़ाई की ओर खिंचने लगा, पढाई सम्बन्धी टिप्स तो मैंने दिया ही। धीरे2 वह भी पढ़ाई में लिप्त हो गया,एम ए भी कर लिया और एक दिन शिक्षा विभाग में नौकरी पा लिया।उसके पीछे छोटे भाई और पिता जी के छोटे से होटल को भी सहारा मिला, पूरा परिवार संभल गया।