माइग्रेन से लड़ाई :-
माइग्रेन जिसे हिंदी में अटकापारी या आधे सिर का सिरदर्द या आधा शीशी सर दर्द , आयुर्वेद में अर्ध विभेदक कहते है, ने मुझे काफ़ी परेशान किया था , करीब दस साल तक। उस समय मेरी आयु लगभग १५ वर्ष रही होगी , नवमी पढ़ता था। सर के सिर्फ दाहिने और तेज दर्द का दौरा पड़ता था , मानो सर फटा जा रहा हो . सरकारी अस्पताल में जाता तो तनखाजीवी डाक्टर सिर्फ देखते ही नाम पूछ कर सर दर्द की कोई दवाई लिख देता था जो बेकार साबित होती। कई वर्ष यूं ही बीत गए . . एक बार एक नामी गरामी डॉ कछवाहा ने पकड़ा कि मुझे माइग्रेन है। फिर उनकी दवा एलोपैथी से मुझे पहली बार आराम मिला . पर स्थायी इलाज नहीं था ये। कुछ अंतराल के बाद फिर सर दर्द होता तो वही दवा दुहरानी पड़ती। १९ वर्ष की आयु के बाद फिर रायपुर में डाक्टर भागवत ने पकड़ा कि मुझे माइग्रेन है जिसका स्थायी रूप से कोई इलाज नहीं । बस दवा लो , फिर कभी हो तो फिर दवा लो।ऐसा करते करते एकाध साल फिर बीत गया। फिर दर्द होने शुरू हुआ तो मेडिकल कालेज के अस्पताल में भागा , चूँकि अनेक दोस्त मेडिकल कोर्स कर रहे थे अत: आसानी थी प्रोफ़ेसर लोगो को दिखाने में। वहा भी माइग्रेन 'डाइग्नोस' हुआ , पर बताया गया कोई स्थायी इलाज नहीं , लाइलाज है यह बिमारी।
अब मैंने एक बात ठान ली -दुनिया में जितने प्रकार के रोग भगवान ने बनाये है उसका इलाज भी कही न कही बनाया है , बस सही जगह, सही व्यक्ति, और सही समय, सही दवाई तक पहुँचना मरीज के भाग्य पर निर्भर करता है। मै लगा रहा। आयुर्वेदिक आदि भी आजमाया पर फेल , टोना टोटका आदि भी आजमा कर देखा , पर वो भी बेकार। एक पत्रिका में पढ़ा कि मनोविज्ञान में इसका इलाज है सो भागते भागते रविशंकर यूनिवर्सिटी के मनोविज्ञान विभाग के डीन के पास जा पहुचा, बोला - मेरे माइग्रेन का इलाज शायद मनोविज्ञान में है ऐसा मैंने एक पत्रिका में पढ़ा है , मेरा इलाज करवा दीजिये। इस पर डीन साहब बोले बाफना जी यदि आपके माइग्रेन का इलाज हो जाए तो मुझे बताना मै भी माइग्रेन से पीड़ित हूँ। फिर मनोचिकित्सक के पास जा पहुंचा , सायकोथेरेपी से कुछ लाभ पहुंचा। पर वर्षो बाद दाहिनी कनपटी पर एक नस में दर्द फिर होने लगा। एक होमियोपैथी के डाक्टर के पास जा पहुंचा , जिसने सी .एम. पोटेंसी की दवा दी तो 'एग्रावेशन' होकर काफ़ी तेज दर्द होने लगा। अब डाक्टर रमानी के पास जा पहुंचा , उन्होंने मेरी होमियोपैथी दवाई खोज ली और उसी से ठीक हो गया उन्होंने मुझे मेरी दवाई बता भी दी ताकि मेरी जानकारी में रहे। यही दवाई मलेरिया के भी काम आती है इससे मलेरिया से भी रक्षा हुई। आज मेरी उम्र ५५ साल हो गयी है और मै लगभग 27 साल से माइग्रेन से पूरी तरह मुक्त हू , मुझे बीस साल में कभी भी माइग्रेन का अटैक नहीं हुआ। साथ ही साथ मलेरिया भी नहीं हुआ। यह अनुभव सिर्फ इसलिए लिख रहा हू ताकि माइग्रेन के रोगियो को सन्देश मिले कि इसका इलाज होमियोपैथी से सम्भव है , अत: वे किसी भी होमियोपैथ के पास जाए और छुटकारा पाये मेरी तरह , इस दर्द को मैंने बहुत भुगता , इस तडफ़न को मै जानता हूं। वैसे रायपुर , भिलाई,आदि आसपास के छत्तीसगढ़ के लोगो के लिए डॉ ईश्वर रमानी का फोन नंबर दे रहा हू ताकि इस आत्महत्या कराने वाले सर दर्द से हमेशा के लिए छुटकारा पा सके -
डॉ. ईश्वर रमानी -भिलाई/रायपुर /कांकेर /बिलासपुर -98271 -17452
(वैसे तत्काल राहत पाने के लिए - एक बंगला पान की पत्ती ले , उस पर पिपरमेंट का सत (ठंडई ) के कुछ टुकड़े रखा कर नीचे एक माचिस की तीली जलाकर आंच दिखाए , इससे सत पिघल जाएगा , इस पिघले सत को माथे पर लगाले , तुरंत माइग्रेन , एवं सर्दी सूखने से हुआ दर्द ठीक हो जाता है , मेरा अनुभूत है , पान का पत्ता बंगला पान का ही ले , कपूरी पान या कटोरी में पिघलाने से असर नहीं करता )
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