रविवार, 1 दिसंबर 2013

मेरी मनोवैज्ञानिक शरारतें -1

             युवा अवस्था से ही मुझे मन को समझने की एक दृष्टि सी मिल गयी थी पता नहीं कैसे यह क्षमता मुझमे आ गया। इसका प्रयोग अपने मनोरंजन के लिए भी और शरारते करने के लिए किया।  मैंने देखा कि किसी के सामने उबासी लिया जाए एक दो बार , तो थोड़े समय बाद सामने वाले को भी उबासी आने लगाती है।  कालेज के दिनों में मेरे अंग्रेजी के प्रोफ़ेसर को किसी स्टूडेंट के उबासी लेने पर डांट पड़ती थी। यह देख मुझे शरारत सूझी।  मैं सामने की सीट पर बैठता था , सो जब सर ब्लैक बोर्ड पर लिख रहे होते तो मैं पीछे देखते हुए जानबूझ  कर नकली उबासी लेता था , दूसरे स्टूडेंट स्वाभाविक रूप से मुझे देखते थे।  बस एक दो बार ऐसा करता फिर कोई न कोई उबासी जरूर अनजाने में ले ही लेता और प्रोफ़ेसर साहब से डाँट खा ही जाता , बेचारा।  किसी को समझ में नहीं आता मेरी यह शरारत।



                                                                   एक बार तो मैं ही खुद फंस गया , नाटक करते करते मुझे खुद को ही अनजाने में सचमुच उबासी आ गयी सर के सामने फिर डाँट पड़ी - फिर- फिर , मगरमच्छ की तरह मुंह फाड़ा !नींद आ रही तो जाओ मुंह धोकर आओ !   

                                  इसी उबासी की तरकीब का मैंने सीए आर्टिकलशिप करते हुए जोरदार प्रयोग किया। एक बड़ा व्यक्ति आफिस में एकाउंट का कार्य करने आने लगा , और मेरे सामने की टेबल में बैठने लगा। गर्मी के दिन थे और १२ बजे के बाद बॉस चले जाते थे।  मुझे शरारत सूझी , जानबूझकर जब भी वह मेरी और देखता मैं नकली उबासी लेता।  धीरे धीरे दो तीन बार ऐसा करने से उसे भी उबासी आने लगती और बाद में नींद सी आने लगने लगी . रोज मैं यह नौटंकी करता , रोज  उसे उबासी दिलाता , फिर वह सोने लगता। रोजाना नींद की आदत पड़ने लगी।  अब बात यहाँ तक हो गयी वह ११ बजे आता , मुश्किल से आधा घंटे बाद ही मेरे बिना उबासी के नाटक के सो जाता कुर्सी पर ही दो -तीन घंटे की नींद लेता। एक बार बॉस ने उस ने देख लिया , लांच में जाने के पहले।  उसे उठाया और कहा कि नींद आती है तो घर जाकर सो जाया करो , यहां  आफिस में नहीं सोना। उसने  जवाब दिया कि खाना खाकर आता हम और गर्मी के दिन है अतः नींद आ जाती है। महीने भर में वह एक हप्ते का भी काम नहीं कर पाया इसी मुए नींद की वजह से। उसे अंत तक मेरी शरारत समझ नहीं आयी।

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